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स्कूली लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन देने के आदेश शीर्ष कोर्ट ने “मासिक धर्म स्वास्थ्य” को मौलिक अधिकार माना जनहित याचिका बनी फैसले की वजह

रायपुर प्रवक्ता.कॉम 31 जनवरी 2026

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में ‘मासिक धर्म स्वास्थ्य’ को मौलिक अधिकार करार दिया। साथ ही देश के सभी स्कूलों (चाहे सरकारी हों या निजी) में कक्षा 6 से 12 तक की सभी छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को किशोर लड़कियों के लिए सभी स्कूलों में केंद्र सरकार की राष्ट्रीय नीति यानी ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को प्रभावी तरीके से लागू करने के निर्देश दिए हैं।

126 पेज के जजमेंट में क्या कहा जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन ने –

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने अपने 126 पन्नों के फैसले में कहा, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार, जीवन के अधिकार का हिस्सा है। पीठ ने देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सभी स्कूलों में किशोर लड़कियों को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने का आदेश देने के साथ-साथ स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए सभी सुविधाओं से युक्त अलग-अलग शौचालयों की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया है।

जनहित याचिका बनी फैसले की वजह

शीर्ष अदालत ने वर्ष 2022 में जया ठाकुर की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें देशभर में स्कूली छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने और स्वच्छ शौचालयों की व्यवस्था करने

03 महीने के भीतर दिशा-निर्देशों का पालन करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों की अनुपलब्धता एक लड़की की गरिमा को कम करती है, क्योंकि गरिमा उन परिस्थितियों में परिलक्षित होती है जो व्यक्ति को बिना अपमान, बहिष्कार या टाले जा सकने वाले कष्ट के जीवन जीने में सक्षम बनाती है। निजता गरिमा से अटूट रूप से जुड़ी हुई है।

की मांग की गई थी। जस्टिस पारदीवाला नेकहा, यह घोषणा सिर्फ कानूनी तंत्र से जुड़े लोगों के लिए नाहीं है, बल्कि उन कक्षाओं के लिए भी है जहां लड़कियां मदद मांगने में हिचकिचाती हैं। यह उन शिक्षकों के लिए भी है जो मदद करना चाहते हैं लेकिन संसाधनों की कमी के कारण असमर्थ हैं। यह उन माता-पिता

पुरुष शिक्षकों को भी किया जाए जागरूक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मासिक धर्म ऐसा विषय नहीं होना चाहिए, जिसके बारे में सिर्फ दबी आवाज में बात की जाए। यह जरूरी है कि लड़कों को इसकी वास्तविकता के बारे में शिक्षित किया जाए।

के लिए भी है जो शायद अपनी चुप्पी के असर को नहीं समझते।

कमजोर लोगों की रक्षा से मापें प्रगतिः यह समाज के लिए है कि वह अपनी प्रगति को इस बात से मापे कि हम सबसे कमजोर लोगों की रक्षा कैसे करते हैं। हम हर उस लड़की तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं जो स्कूल न

राज्य-केंद्र शासित प्रदेशों के लिए दिशा-निर्देश

शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के सभी स्कूलों में एएसटीएम डी-6954 मानकों के अनुसार निर्मित ऑक्सी-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं।

सैनिटरी नैपकिन शौचालय परिसर के भीतर सैनिटरी नैपकिन वेडिंग मशीनों के माध्यम से या किसी निर्दिष्ट स्थान के जरिए छात्राओं को आसानी से उपलब्ध हो।

शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में हर स्कूल में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर स्थापित किए जाएं। इसमें मासिक धर्म की आपात स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त अंडरवियर, यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल पैड और अन्य आवश्यक सामग्री होनी चाहिए।शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सभी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिएअलग-अलग शौचालय ही, जिनमें हर समय पानी उपलब्ध हो।सैनिटरी नैपकिन कचरा निपटान की व्यवस्था करें

हर स्कूल में सैनिटरी नैपकिन के निफ्टान को नवीनतम अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुसार सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल तंत्र विकसित करें। सभी शौचालय इकाइयों में सैनिटरी सामग्री एकत्र करने को ढका हुआ कूड़ेदान होना चाहिए और इन डिब्बों की नियमित सफाई व रखरखाव तय किया जाए।जाने की शिकार हो सकती है, क्योंकि उसके शरीर को बोझ समझा गया, जबकि गलती उसकी नहीं है।सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 3 महीने की अवधि के भीतर जारी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।

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