छत्तीसगढ़ में महंगाई भत्ते का “गेम”: वादे के बावजूद केंद्र की देय तिथि से वंचित कर्मचारी क्या वादों की नैतिकता खत्म हो गई

रायपुर प्रवक्ता. कॉम 21 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़: ‘देय तिथि’ पर सरकार का रुख और कर्मचारियों की मायूसी
छत्तीसगढ़ में लाखों सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ते (DA) को लेकर जारी गतिरोध थमता नहीं दिख रहा है। हालांकि राज्य सरकार ने समय-समय पर महंगाई भत्ते में वृद्धि की है, लेकिन “देय तिथि” से भुगतान न मिलने और एरियर (बकाया राशि) की अनिश्चितता ने प्रदेश भर के कर्मचारी संगठनों में भारी नाराजगी पैदा कर दी है।
क्या है मुख्य असंतोष?
कर्मचारी संगठनों का मुख्य तर्क यह है कि केंद्र सरकार जिस तिथि से डीए लागू करती है, राज्य सरकार उसे काफी समय बाद लागू करती है। इसका सीधा असर कर्मचारियों की जेब पर पड़ता है, क्योंकि उन्हें महीनों के एरियर का लाभ नहीं मिल पाता।
वादे बनाम वास्तविकता: सरकार ने बार-बार केंद्र के समान डीए देने की बात तो कही है, लेकिन वह ‘देय तिथि’ के पालन को लेकर मौन बनी हुई है।
संगठनों की विफलता: प्रदेश में दर्जनों कर्मचारी संघ सक्रिय हैं, लेकिन इन संगठनों की बड़ी संख्या और बार-बार होने वाली हड़तालें भी सरकार को ‘देय तिथि’ से भुगतान करने के लिए मजबूर करने में नाकाम रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि संगठनों में आपसी तालमेल की कमी और सरकार की कठोर वित्तीय नीतियों के कारण यह मांग हर बार अधूरी रह जाती है।
एरियर पर ‘पेंडिंग’ का पेंच
छत्तीसगढ़ के वित्त विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, महंगाई भत्ते में वृद्धि की घोषणाएं तो हुई हैं, लेकिन एरियर के भुगतान की प्रक्रिया को लेकर कोई स्पष्ट समय-सीमा तय नहीं की गई है। सरकार द्वारा गठित उच्च-स्तरीय कमेटी भी अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई है, जिससे कर्मचारी ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
तुलनात्मक स्थिति (छत्तीसगढ़ vs अन्य राज्य)
मध्य प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में भाजपा की ही सरकार है, लेकिन वहां प्रशासनिक व्यवस्था ऐसी है कि डीए का लाभ अक्सर केंद्र की घोषित तारीख के बेहद करीब या उसी तिथि से मिलना सुनिश्चित किया जाता है। छत्तीसगढ़ के कर्मचारी अब इसी मॉडल को राज्य में लागू करने की मांग कर रहे हैं, ताकि वित्तीय नुकसान से बचा जा सके।
प्रमुख मांगें जो आज भी लंबित हैं:
देय तिथि का सम्मान: केंद्र सरकार की घोषणा के साथ ही उसी प्रभावी तिथि से राज्य में डीए लागू हो।
एरियर का स्पष्ट भुगतान: लंबित एरियर को किस्तों में या जीपीएफ (GPF) में जमा करने की ठोस समय-सीमा जारी हो।
उच्च-स्तरीय कमेटी की पारदर्शिता: कर्मचारी संघों ने मांग की है कि कमेटी की बैठकों और निर्णयों को सार्वजनिक किया जाए।





