छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के दौरान असंतोषजनक प्रदर्शन पर बिना विभागीय जांच सेवा समाप्त की जा सकती है
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने खारिज की रिट अपील छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह महत्वपूर्ण निर्णय अभी हाल ही में 18 अक्टूबर 2026 को आया है (मामला: डॉ. प्रदीप कुमार शुक्ल बनाम गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी, रिट अपील संख्या 667/2026)
विधि संवाददाता, बिलासपुर
19 अक्टूबर 2026
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सेवा मामलों ( से जुड़े कानून को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नज़ीर बनने वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई कर्मचारी परिवीक्षा अवधि के दौरान अपनी सेवाएं संतोषजनक ढंग से देने में विफल रहता है, तो नियोक्ता बिना किसी औपचारिक चार्जशीट या विभागीय जांच के उसकी सेवाएं समाप्त कर सकता है।
क्या है पूरा मामला?
नियुक्ति व विवाद
याचिकाकर्ता डॉ. प्रदीप कुमार शुक्ला को 2012 में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय (गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी, बिलासपुर) के बायोटेक्नोलॉजी विभाग में दो वर्ष के प्रोबेशन पर एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया था।
प्रोबेशन विस्तार व बर्खास्तगी
सेवाकाल के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन ने पाया कि उनका काम और आचरण संतोषजनक नहीं था, जिसके बाद उनके प्रोबेशन पीरियड को एक वर्ष के लिए बढ़ाया गया और बाद में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
हाईकोर्ट में चुनौती
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि बर्खास्तगी से पहले कोई नियमित विभागीय जांच नहीं कराई गई और न ही उन्हें सुनवाई का पूरा अवसर दिया गया। एकलपीठ द्वारा याचिका खारिज होने के बाद मामला डिवीजन बेंच (WRIT APPEAL No. 667 of 2026) के समक्ष पहुंचा।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
‘नॉन-स्टिग्मैटिक’ आदेश पर जांच जरूरी नहीं
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने फैसले में रेखांकित किया कि यदि सेवा समाप्ति का आदेश केवल कार्य प्रदर्शन (Performance) पर आधारित है और उस पर कोई गंभीर नैतिक या आपराधिक दाग (Stigma) नहीं लगाया गया है, तो नियोक्ता को लंबी अनुशासनात्मक जांच प्रक्रिया अपनाने की वैधानिक आवश्यकता नहीं है।
स्थायी कर्मचारियों जैसा अधिकार नहीं
अदालत ने माना कि प्रोबेशन पर नियुक्त कर्मचारी को नियमित कर्मचारियों की भांति स्वतः पूर्ण विभागीय जांच का अधिकार प्राप्त नहीं होता। प्रोबेशन का मूल उद्देश्य ही कर्मचारी की योग्यता और उपयुक्तता का परीक्षण करना है।






