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विजया दशमी – 21वीं सदी में प्रासंगिकता और अंतर्मन के रावण का संहार ,आत्म-मंथन और विजय का उत्सव

21वीं सदी में भी क्यों फीकी नहीं पड़ी विजया दशमी की चमक? जानिए अपने भीतर के रावण को मारना क्यों ज़रूरी है ​दशहरा 2026: केवल पुतला दहन नहीं, अपने अंदर के रावण को खत्म करने का पर्व

रायपुर प्रवक्ता.कॉम

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विजया दशमी (दशहरा) सनातन परंपरा के सबसे पावन और महत्त्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यतानुसार, इसी दिन भगवान श्री राम ने लंकापति रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया था और जगज्जननी माँ दुर्गा ने महिषासुर का संहार कर सृष्टि को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी।

​यह केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक घटना का उत्सव नहीं है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का शाश्वत संदेश है।

​21वीं सदी में भी क्यों बनी हुई है इसकी अटूट मान्यता?

​वैज्ञानिक प्रगति, आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल क्रांति के इस 21वीं सदी के युग में भी विजया दशमी की मान्यता और उत्साह में रत्ती भर कमी नहीं आई है। इसके पीछे कई मुख्य कारण हैं:

शाश्वत जीवन मूल्य

समय कितना भी बदल जाए, लेकिन सत्य, न्याय, करुणा और मर्यादा जैसे मूल्य कभी पुराने नहीं होते। आज भी इंसान बुराई से परेशान होकर न्याय और सत्य की तलाश करता है।

सांस्कृतिक जड़ें और पहचान

आज की आधुनिक दुनिया में जब इंसान अकेलापन और तनाव महसूस करता है, तो ऐसे त्योहार उसे परिवार, समाज और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हैं।

बच्चों में नैतिक संस्कारों का बीजारोपण

नई पीढ़ी को सही और गलत का अंतर समझाने के लिए रामलीला, दशहरा और विजया दशमी के संदेश सबसे प्रभावी माध्यम हैं।

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

रावण दहन का प्रतीक यह विश्वास दिलाता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न लगे, उसका अंत निश्चित है। यह समाज में एक नई उम्मीद और सकारात्मकता भरता है।

​अपने भीतर के रावण का वध क्यों ज़रूरी है?

​आज के युग में रावण कोई दस सिर वाला बाहरी दैत्य नहीं है। आज का रावण हमारे विचारों, आदतों और व्यवहार में छिपा हुआ है। यदि हम बाहर रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन अपने अंदर की बुराइयों को पोसते रहते हैं, तो विजया दशमी मनाना केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है।

​अपने भीतर के रावण का संहार करना आज इन कारणों से अत्यंत आवश्यक है:

​आधुनिक रावण के रूप

​आज हमारे भीतर कई तरह के रावण वास करते हैं:

अहंकार

पद, धन, ज्ञान या रूप का घमंड।

क्रोध और असहिष्णुता

छोटी-छोटी बातों पर अपना आपा खोना और दूसरों के प्रति नफरत रखना।

लालच और स्वार्थ

दूसरों के अधिकारों को छीनकर केवल अपना फायदा सोचना।

आभासी दुनिया का रावण

सोशल मीडिया पर दूसरों को नीचा दिखाना, नफरत फैलाना और संवेदनहीन बनना।

​मानसिक शांति और व्यक्तिगत विकास के लिए

​जब तक इंसान के भीतर काम, क्रोध, मद, मोह और मत्सर (ईर्ष्या) जैसी बुराइयां रहेंगी, तब तक उसे सच्चे सुख और शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। भीतर के रावण का वध करने से ही आत्म-संतोष और मानसिक सुदृढ़ता मिलती है।

एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए

​यदि हर व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार और स्वार्थ का अंत करने का संकल्प ले ले, तो समाज से अपराध, भ्रष्टाचार, हिंसा और भेदभाव अपने आप समाप्त हो जाएंगे।

​विजया दशमी का सार

​विजया दशमी हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम केवल लकड़ी और कागज़ के बने रावण को जलाकर कर्तव्य की इतिश्री न समझें। आइए, इस विजया दशमी पर हम अपने भीतर झांकें और अपने अंदर छिपे अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध और स्वार्थ जैसे रावण के प्रतीकों को दहन करें, ताकि हमारे भीतर के राम (सद्गुण और विवेक) की विजय हो सके

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