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राज्य शिक्षा आयोग में 7 साल से अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं होने से सरकार की मंशा पर सवाल शिक्षा जैसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयोग के गठन में देरी क्यों ?

नियमानुसार राज्य शिक्षा आयोग में अध्यक्ष व सचिव के अलावा दो अशासकीय क्षेत्र में काम कर रहे शिक्षाविदों को बतौर सदस्य नियुक्ति किया जाना है

रायपुर ,प्रवक्ता. कॉम दिनांक 4 अप्रैल 2025
छत्तीसगढ़ शासन ने अपने कार्यकाल के डेढ़ वर्ष बाद 36 निगम मंडल और आयोग में नियुक्तियाँ हुई लेकिन सरकार राज्य शिक्षा आयोग में अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की जिससे शिक्षा के क्षेत्र में राज्य स्तर पर जो नीतियां और बेहतर तरीके से बनाई जा सकती थीं उस पर अभी तक विराम लगा हुआ है।
अभी भी राज्य में कक्षा 5 वीं और आठवीं तक के बच्चे भाषा के लेखन और पठन में सौ फीसदी दक्षता प्राप्त नहीं कर सके हैं।
राज्य शिक्षा आयोग के गठन नहीं होने से बच्चों के लिए स्थानीय स्तर पर बेहतर पाठ्यक्रम का निर्माण, स्कूल में छात्रों के चरित्र निर्माण में अधिक उल्लेखनीय कार्य किया जा सकता था।
छत्तीसगढ़ में राज्य शिक्षा आयोग में अध्यक्ष क्यों जरूरी है – शिक्षा और शिक्षकों के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाओं जो कि इस प्रकार से क्रियान्वित होने चाहिए जिसके लिए आयोग में अध्यक्ष जरूरी है
शिक्षा का मकसद, राष्ट्रीय और सामाजिक भावना से भरे आदर्श नागरिकों का निर्माण करना होना चाहिए.
शिक्षा में व्यावसायिक विषयों को शामिल करना चाहिए.
माध्यमिक शिक्षा में छात्रों में नेतृत्व की गुणवत्ता विकसित करनी चाहिए.
पाठ्यक्रम में ऐसे विषय होने चाहिए जो छात्रों में सहयोग, अनुशासन, विनम्रता, प्रेम, दया, और भाईचारे की भावना विकसित कर सकें.
शिक्षा में मातृभाषा या राज्य भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहिए.
माध्यमिक स्तर पर छात्र को कम से कम तीन भाषाएं सीखनी चाहिए.
पाठ्यक्रम में विविधता लाने चाहिए.
एक मध्यवर्ती स्तर जोड़ना चाहिए.संख्यात्मक अंक देने के बजाय सांकेतिक अंक दिए जाने चाहिए.छत्तीसगढ़ में ओपन स्कूल के पाठ्यक्रम और परीक्षा की पद्धति को बदलने के जरूरत है । वहां की परीक्षा प्रणाली को वस्तुनिष्ठ (MCQ) परीक्षण-पद्धति को अपनाना चाहिए.
छत्तीसगढ़ में डॉ रमनसिंह सिंह के कार्यकाल में राज्य शिक्षा आयोग का हुआ था गठन

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प्रदेश में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने 20 सितंबर 2013 को राज्य शिक्षा आयोग का गठन किया था। पहला अध्यक्ष चंद्रभूषण शर्मा को बनाया गया था। साथ में सदस्य आरसी पांडव को नियुक्त किया गया था। इसके बाद विधानसभा चुनाव के चलते 19 दिसंबर 2013 को यह कार्यकाल भंग हो गया। इसके बाद फिर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो 15 जून 2015 को फिर से आयोग के अध्यक्ष के रूप में शर्मा की नियुक्ति की गई थी। साथ ही दो सदस्य नियुक्त हुए थे। 2018 में चुनाव होने के बाद अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति भंग हो गई और अब तक ये कुर्सियां खाली पड़ी हैं।

सचिव और दो बाबुओं के भरोसे चल रहा है राज्य शिक्षा आयोग का कार्य –

राज्य में दो लाख से अधिक शिक्षकों और लाखों विद्यार्थियों के लिए गठिन राज्य शिक्षा आयोग वर्तमान में बाबुओं और सचिव के भरोसे चल रहा है। सरकार को आयोग के लिए अब तक योग्य व्यक्ति की तलाश है ।

छत्‍तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता के लिए गठित राज्य शिक्षा आयोग का डब्बा गोल हो गया है। कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के चार साल बाद भी आयोग के लिए न पूर्णकालिक अध्यक्ष और न ही सदस्यों की नियुक्ति हो पाई है। यूं कहें कि यह आयोग सफेद हाथी बनकर रह गया है। केवल सचिव और दो बाबुओं के जरिए आयोग को नाममात्र के लिए संचालित किया जा रहा है। ऐसे में शिक्षकों की वेतन विसंगति, पदोन्न्ति, स्थानांतरण शिक्षकों की प्रमुख मांगों व समस्याओं, शिक्षा और शैक्षणिक प्रबंधन से संबंधित नवाचार और स्कूलों में फीस संरचना आदि के विवाद को सुलझाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं रह गई है। शिक्षक संगठनों ने राज्य सरकार से शिक्षा आयोग में अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति करने की मांग की है।

नियमानुसार यहां अध्यक्ष व सचिव के अलावा दो अशासकीय क्षेत्र में काम कर रहे शिक्षाविदों को बतौर सदस्य नियुक्ति किया जाना है। आयोग में एक स्थायी कार्यकारिणी समिति का भी गठन करना है, जिसमें आदिम जाति विभाग, पंचायत विभाग और नगरीय प्रशासन विभाग के अधिकारी पदेन अधिकारी होते हैं। हालांकि विभाग में पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं होने पर विभागीय मंत्री पदेन अध्यक्ष होते हैं पर यह व्यवस्था तब तक के लिए होती है जब तक अध्यक्ष की नियुक्ति न हो जाए। प्रदेश में छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम व अन्य आयोगों में भी यही व्यवस्था है। अध्यक्ष की जब तक नियुक्ति नहीं होती है तब तक विभागीय मंत्री ही कामकाज चलाते हैं।



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