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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रांत प्रचारक का पद हो सकता है खत्म नई व्यवस्था हो रही है तैयार प्रतिनिधि सभा की बैठक में आया प्रस्ताव

नई व्यवस्था में जिला और ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ता सीधे संभाग प्रचारकों के संपर्क में रहेंगे। इससे संवाद तेज होगा, बहस मुबाहिसा ज्यादा पारदर्शी होगा और संगठन की रणनीति जमीनी हकीकत से ज्यादा करीब होगी।संघ के भीतर यह भी चर्चा है कि जिला स्तर तक प्रचारक या सहायक प्रचारक जैसे नए पद बनाए जा सकते हैं, ताकि स्थानीय इकाइयों की कार्यक्षमता और जवाबदेही बढ़ाई जा सके

रायपुर प्रवक्ता.कॉम 16 मार्च 2026

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देश की नैतिकता और तटस्थ राजनीति में एक बड़ा बदलाव पेश किया गया है। दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने संगठनात्मक ढांचे में व्यापक फेरबदल की तैयारी कर रहा है। करीब 40 लाख स्वयंसेवकों और 83 हजार से ज्यादा शाखाओं वाले इस विशाल संगठन में अब ऐसा स्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है, जो ऊपर से नीचे नहीं बल्कि नीचे से ऊपर तक संगठन की ताकत को मजबूत करेगा।

प्रांत प्रचारक का पद हो सकता है खत्म

इस अहम बदलाव का प्रस्ताव हरियाणा के पानीपत जिले के समालखा में 13, 14 और 15 मार्च को होने वाली उच्चस्तरीय बैठक में पेश किया गया। संघ के अंदरूनी हलकों में इसे संगठनात्मक कायाकल्प बताया जा रहा है। मकसद साफ है संघ को पहले से ज्यादा टारगेट-ओरिएंटेड, जवाबदेह और रिजल्ट-केंद्रित बनाना।अब तक संघ के ढांचे में “राज्य” कोई अलग प्रशासनिक इकाई नहीं थी। बड़े राज्यों को कई प्रांतों में बांटकर वहां प्रांत प्रचारक नियुक्त किए जाते थे, जो जमीनी स्वयंसेवकों और शीर्ष नेतृत्व के बीच कड़ी का काम करते थे। वर्तमान में देशभर में लगभग 45 प्रांत प्रचारक सक्रिय हैं।

लेकिन अब प्रस्तावित व्यवस्था के तहत प्रांत प्रचारकों की जगह संभाग प्रचारक नियुक्त किए जाएंगे। यानी जहां पहले एक राज्य में प्रांत प्रचारक होते थे, वहां अब एक ही राज्य प्रचारक पूरे राज्य की जिम्मेदारी संभालेगा। इसके ऊपर क्षेत्र प्रचारक की व्यवस्था बनी रहेगी, मगर उनकी संख्या भी सीमित करने की योजना है।

फिलहाल संघ का संगठनात्मक ढांचा 11 क्षेत्रों में बंटा हुआ है। नए प्रस्ताव में इसे घटाकर 9 क्षेत्र करने की तैयारी है। इसका मतलब यह है कि ऊपरी स्तर के पदाधिकारी कम होंगे, लेकिन संभाग या डिवीजन स्तर पर नए पद सृजित किए जाएंगे। नई व्यवस्था में किसी राज्य के दो प्रशासनिक मंडलों या कमिश्नरियों को मिलाकर एक संभाग बनाया जाएगा और वहां संभाग प्रचारक तैनात होंगे। इससे संगठन का फोकस सीधे जमीनी स्तर पर बढ़ेगा।

संघ के प्रस्तावित ढांचे के तहत अलग-अलग राज्यों में नई जिम्मेदारियों का बंटवारा होगा। उदाहरण के तौर पर बिहार में 9 प्रशासनिक मंडल हैं, इसलिए यहां 4 से 5 संभाग प्रचारक बनाए जा सकते हैं।इसी तरह उत्तर प्रदेश के 18 सरदार मंडलों में 9 सरदारों का प्रस्ताव है, जहां 9 सरदार मंडल होंगे। वहीं मध्य प्रदेश में 10 मंडलों के आधार पर करीब 5 मंडलों और राजस्थान में 7 मंडलों के हिसाब से 3 से 4 संभाग प्रचारक नियुक्त किए जा सकते हैं।

नई व्यवस्था में जिला और ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ता सीधे संभाग प्रचारकों के संपर्क में रहेंगे। इससे संवाद तेज होगा, बहस मुबाहिसा ज्यादा पारदर्शी होगा और संगठन की रणनीति जमीनी हकीकत से ज्यादा करीब होगी।संघ के भीतर यह भी चर्चा है कि जिला स्तर तक प्रचारक या सहायक प्रचारक जैसे नए पद बनाए जा सकते हैं, ताकि स्थानीय इकाइयों की कार्यक्षमता और जवाबदेही बढ़ाई जा सके।संघ के इतिहास में यह बदलाव काफी अहम माना जा रहा है। इससे पहले 1949 में संघ ने अपना लिखित संविधान तैयार कर सरकार को सौंपा था और उसी समय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को भी स्वीकार किया गया था। उसके बाद कई छोटे बदलाव हुए, जैसे गणवेश में परिवर्तन, लेकिन संगठनात्मक ढांचे में इतना बड़ा बदलाव नहीं हुआ।

संघ सूत्रों के मुताबिक इस प्रस्ताव को सितंबर 2026 की बैठक में अंतिम मंजूरी के बाद जनवरी-फरवरी 2027 तक इसे पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य है।दिलचस्प बात यह है कि इस नए माइक्रो-मैनेजमेंट और ग्राउंड कैडर मॉडल का पहला बड़ा इम्तिहान कुल मिलाकर संघ अब अपनी रणनीति को केंद्रीकृत ढांचे से निकालकर जमीनी स्तर तक फैलाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। मकसद साफ है संगठन को ज्यादा फुर्तीला, जवाबदेह और प्रभावशाली बनाना।अगर यह नया ढांचा सफल होता है तो आने वाले वर्षों में यह न सिर्फ संघ बल्कि भारतीय सियासत की ताकत के समीकरण को भी नई दिशा दे सकता है।

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