NewsPolicy newsRTIकाम की खबरछत्तीसगढ़
Trending

आरटीआई का मज़ाक: छत्तीसगढ़ में ‘सुशासन’ को चुनौती दे रहे जन सूचना अधिकारी, जानकारी के लिए अपीलों का चक्कर काट रहे आवेदक

कई तरह के तर्क और अधिनियम बताकर लोक हित से जुड़ी सामान्य जानकारियां भी रोक दी जाती हैं। अधूरी और भ्रामक जानकारी 30 दिन पूरे होने के आखिरी वक्त पर ऐसा जवाब दिया जाता है जिससे आवेदक मजबूरन अपील में जाए।

रायपुर प्रवक्ता.कॉम 21 मई 2026

Join WhatsApp

छत्तीसगढ़ में पारदर्शिता और सुशासन का दावा करने वाली व्यवस्था में ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ (RTI) दम तोड़ता नजर आ रहा है। सरकारी विभागों के जन सूचना अधिकारी (PIO) कानून के प्रावधानों को ठेंगा दिखाते हुए आवेदकों को तय समय सीमा में जानकारी उपलब्ध नहीं करा रहे हैं। स्थिति यह हो गई है कि सीधे और स्पष्ट मामलों में भी आवेदकों को प्रथम और द्वितीय अपील का लंबा और थकाऊ रास्ता तय करना पड़ रहा है।
​जनता के इस लोकतांत्रिक अधिकार पर सरकारी दफ्तरों में बैठे कुछ अधिकारी जान-बूझकर कुंडली मारकर बैठे हैं, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या वास्तव में प्रदेश में सुशासन की अवधारणा लागू है?
​स्कूल शिक्षा और पंचायत , वन विभाग का सबसे बुरा हाल
​RTI कानून के क्रियान्वयन को लेकर सबसे खराब स्थिति स्कूल शिक्षा विभाग में देखने को मिल रही है।
​स्कूल शिक्षा विभाग: शिक्षकों के अटैचमेंट, फंड ट्रांसफर, और स्कूलों के संधारण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां महीनों तक दबाकर रखी जाती हैं।

​यही हाल स्वास्थ्य, राजस्व और लोक निर्माण (PWD) , वन , जैसे कई अन्य बड़े विभागों का भी है, जहां भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए आरटीआई आवेदनों को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाता है।
​’जानबूझकर जानकारी न देना’ बना अधिकारियों का हथियार
​RTI कार्यकर्ताओं का कहना है कि जन सूचना अधिकारी सोची-समझी रणनीति के तहत काम कर रहे हैं। वे जानते हैं कि सामान्य आवेदक अपील प्रक्रिया की पेचीदगियों और समय की बर्बादी से डरकर पीछे हट जाएगा।
छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग ने सूचना छिपाने, भ्रामक जानकारी देने और आरटीआई (RTI) नियमों का उल्लंघन करने वाले लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ हाल ही में बेहद कड़े कदम उठाए हैं।

अधिकारियों के बहाने और पैंतरे जमीनी हकीकत और असर
“रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है” फाइलों को जानबूझकर गायब या दबा दिया जाता है ताकि विसंगतियां सामने न आएं।
“तीसरे पक्ष (Third Party) की जानकारी है” धारा 8(1)(j) का गलत हवाला देकर लोक हित से जुड़ी सामान्य जानकारियां भी रोक दी जाती हैं।
अधूरी और भ्रामक जानकारी 30 दिन पूरे होने के आखिरी वक्त पर ऐसा जवाब दिया जाता है जिससे आवेदक मजबूरन अपील में जाए।
अपीलों का अंबार, आयोग पर बढ़ा दबाव
​जब जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी स्तर पर आवेदकों को निराश किया जाता है, तो उनके पास छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इसके कारण आयोग में द्वितीय अपीलों का अंबार लग गया है। हालांकि, राज्य सूचना आयोग द्वारा समय-समय पर लापरवाही बरतने वाले जन सूचना अधिकारियों पर 25,000 रुपये तक का अधिकतम जुर्माना भी लगाया जा रहा है, लेकिन अधिकारियों में इस दंडात्मक कार्रवाई का डर खत्म हो चुका है क्योंकि यह जुर्माना उनकी जेब से नहीं बल्कि कई बार प्रशासनिक हीला-हवाली के चलते टल जाता है।
​सुशासन पर सवाल: “जब एक आम नागरिक को यह जानने के लिए कि सरकारी पैसे का इस्तेमाल कहां हुआ, सालों तक चक्कर काटने पड़ें, तो इसे सुशासन नहीं बल्कि प्रशासनिक तानाशाही कहा जाएगा। सरकार को डिजिटल आरटीआई पोर्टल को मजबूत करने के साथ-साथ दोषी अधिकारियों को सीधे सस्पेंड करने जैसे कड़े कदम उठाने होंगे।” — एक आरटीआई कार्यकर्ता, रायपुर
​यदि सरकार वाकई पारदर्शिता को लेकर गंभीर है, तो उसे केवल घोषणाओं से हटकर हर विभाग के जन सूचना अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। अन्यथा, भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का यह सबसे मजबूत हथियार सिर्फ एक कागजी कानून बनकर रह जाएगा।

आयोग द्वारा की जा रही कार्रवाई और जुर्माने के आंकड़े इस प्रकार हैं:
​1. हालिया ऐतिहासिक कार्रवाई (मई 2026)
​मई 2026 में छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग ने आरटीआई के तहत एक ऐतिहासिक और अब तक का सबसे बड़ा जुर्माना आदेश जारी किया है।

रायपुर डीईओ पर लगाया जुर्माना
​एक ही मामले में ₹2,56,000 की वसूली: सामाजिक कार्यकर्ता विकास तिवारी की अपील पर सुनवाई करते हुए आयोग ने एक जन सूचना अधिकारी से 1,26,000 पन्नों की जानकारी देने और लापरवाही बरतने के एवज में ₹2,56,000 वसूलने का बड़ा आदेश दिया है।
​शिक्षा विभाग पर कड़ा एक्शन: इसी दौरान जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय के जन सूचना अधिकारियों पर भी अलग-अलग चार मामलों में ₹25,000 से लेकर ₹1,00,000 तक का जुर्माना लगाया गया है।
​2. विगत वर्षों के सामूहिक आंकड़े (वार्षिक समीक्षा)
​सूचना आयोग के रिकॉर्ड और आरटीआई समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों पर जुर्माने का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है:
​वर्ष 2024-25 का आंकड़ा:

एक बड़े खुलासे के मुताबिक, वर्ष 2024 से 2025 के बीच ही करीब 639 शासकीय अफसरों व जन सूचना अधिकारियों पर कार्रवाई की गई और उनसे ₹1.5 करोड़ से अधिक का जुर्माना वसूला गया।
​सुकमा में बड़ी कार्रवाई (अगस्त 2025): सुकमा जिले के चार ग्राम पंचायत सचिवों (कोंडासांवली, दुलेड, चिमलिपेंटा और सुरपनगुड़ा) द्वारा समय पर जानकारी न देने के कारण आयोग ने उन पर ₹25-25 हजार का अधिकतम आर्थिक दंड लगाया था।
​किन पदों के अधिकारियों पर गिर रही है गाज?
​आयोग द्वारा जिन अधिकारियों पर सबसे ज्यादा जुर्माना लगाया जा रहा है, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
​खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) और जिला शिक्षा कार्यालय के अधिकारी
​जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) और ग्राम पंचायत सचिव
​राजस्व विभाग के तहसीलदार व नायब तहसीलदार
​नगरीय निकायों (नगर पालिका/नगर निगम) के जन सूचना अधिकारी
​आयोग का सख्त रुख:

राज्य सूचना आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि आवेदकों को परेशान करने और 30 दिनों की समय सीमा का पालन न करने वाले अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (NIC) और मोबाइल के जरिए ऑनलाइन सुनवाई होने से आयोग त्वरित फैसले ले रहा है, जिससे दोषियों पर तत्काल जुर्माना तय हो रहा है।

जानकारी नहीं मिलने पर कार्यवाही के प्रावधान

सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत यदि कोई जन सूचना अधिकारी (PIO) तय समय सीमा (सामान्यतः 30 दिन) के भीतर जानकारी नहीं देता है, या जानबूझकर गलत जानकारी देता है, तो अधिनियम की धारा 20 के तहत उसके खिलाफ कड़ी दंडात्मक और अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।

​यह कार्रवाई राज्य या केंद्रीय सूचना आयोग (Information Commission) द्वारा की जाती है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित कदम उठाए जाते हैं:

​1. आर्थिक जुर्माना (Penalty) — धारा 20(1)

​यदि सूचना आयोग को लगता है कि अधिकारी ने बिना किसी उचित कारण के आरटीआई आवेदन लेने से मना किया है, या समय पर जानकारी नहीं दी है, तो आयोग उस पर जुर्माना लगाता है:

  • दैनिक जुर्माना: ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जाता है।
  • अधिकतम सीमा: यह जुर्माना अधिकतम ₹25,000 तक हो सकता है।
  • व्यक्तिगत भुगतान: यह राशि विभाग नहीं देता, बल्कि दोषी अधिकारी को अपनी व्यक्तिगत सैलरी (जेब) से भरनी पड़ती है।

​2. अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश — धारा 20(2)

​यदि कोई जन सूचना अधिकारी बार-बार यह गलती करता है, या बिना किसी ठोस कारण के लगातार जानकारी देने में बाधा डालता है, तो सूचना आयोग के पास यह अधिकार है कि वह:

  • ​दोषी अधिकारी के खिलाफ उसके सेवा नियमों (Service Rules) के तहत विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) करने के लिए उसके वरिष्ठ विभाग प्रमुख (Competent Authority) को सिफारिश भेजे। इसमें अधिकारी की पदोन्नति (Promotion) रुकना या चरित्र पंजिका (CR) में ब्लैक मार्क लगना शामिल हो सकता है।

​3. अन्य महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान

  • निःशुल्क जानकारी: यदि अधिकारी 30 दिनों के भीतर जानकारी देने में विफल रहता है, तो आवेदक को वह जानकारी पूरी तरह से मुफ्त (Free of Cost) दी जाएगी, भले ही वह सैकड़ों पन्नों की क्यों न हो।
  • सबूत का भार अधिकारी पर: आयोग के सामने जन सूचना अधिकारी को ही यह साबित करना होता है कि उसने सही नीयत से काम किया और जानकारी रोकने के पीछे उसका कोई गलत इरादा नहीं था।


Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button