असमंजस में छत्तीसगढ़ के शिक्षक: बिखरा नेतृत्व और संगठनों की आपसी फूट हक की लड़ाई में सबसे बड़ा रोड़ा !

रायपुर प्रवक्ता.कॉम 24 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ में पंचायत निकाय, संविदा और शिक्षा गारंटी योजना से शिक्षाकर्मी बने और 2018 के अंत में संविलियन प्राप्त करने वाले शिक्षक इन दिनों गंभीर असमंजस और दोराहे पर खड़े हैं। टीईटी (TET) अनिवार्यता, वीएसके (VSK) ऐप से ऑनलाइन हाजिरी और अन्य प्रशासनिक जटिलताओं के बीच शिक्षकों के सामने सबसे बड़ा संकट उनके नेतृत्व का बिखराव बन गया है।
शिक्षकों की असमंजसता के कारण
संगठनों की बहुलता: प्रदेश में शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा का दावा करने वाले 15 से अधिक संगठन सक्रिय हैं, लेकिन इनमें आपसी समन्वय और एकरूपता का अभाव साफ नजर आ रहा है।
नेतृत्व की स्वीकार्यता और वर्चस्व: शिक्षकों के बीच यह चर्चा आम है कि विभिन्न संगठनों के नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई और आपसी अहं के कारण पूरा शिक्षक वर्ग एक साझा मंच पर आने से कतरा रहा है।
अलग-अलग मोर्चे: एक तरफ जहां कुछ पुराने संगठनों ने मिलकर अलग मोर्चा बनाया है, वहीं दूसरी तरफ सहायक शिक्षकों की मांगों को लेकर बने शिक्षक सहायक शिक्षक फेडरेशन (अध्यक्ष – रवीन्द्र राठौर) ने शिक्षक साझा मोर्चा के तहत आंदोलन का शंखनाद किया है। उन्होंने अपने सहयोगी संगठन के साथ मिलकर 22 अगस्त को बड़ा और प्रभावी आंदोलन किया है।
शिक्षकों की परिपक्वता: प्रदेश के शिक्षक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा समझदारी का परिचय देते हुए तब तक बड़े आंदोलनों से दूरी बना रहा है, जब तक कि सभी धड़े पूरी तरह एकजुट होकर एक मंच पर नहीं आ जाते।
आगे की राह: एकता ही सफलता की मास्टर की
शिक्षकों का यह दर्द पूरी तरह जायज है कि जब तक नेतृत्व एक मंच पर नहीं आएगा, तब तक सरकार से किसी भी बड़ी मांग पर निर्णायक जीत हासिल करना कठिन होगा। जैसा कि सहायक शिक्षक फेडरेशन के अध्यक्ष रवीन्द्र राठौर के नेतृत्व में ब्लॉक स्तर पर हुए आंदोलनों से यह स्पष्ट हुआ है कि जमीनी स्तर पर शिक्षकों में ऊर्जा और असंतोष दोनों है।
यदि सभी शिक्षक संगठन अपने निजी अहं और वर्चस्व की लड़ाई को छोड़कर बाकी शिक्षक प्रतिनिधियों के साथ मिलकर एक मजबूत और एकीकृत साझा मोर्चा बनाते हैं, तभी टीईटी मुक्ति और अन्य समस्याओं का स्थायी समाधान संभव हो सकेगा।: “अधूरी एकता” शिक्षकों के संघर्ष को कमजोर करती है। जब तक छत्तीसगढ़ के तमाम शिक्षक संगठन एकजुट होकर एक आवाज में हुंकार नहीं भरेंगे, तब तक नीतिगत फैसलों के खिलाफ लड़ाई जीतना मुश्किल बना रहेगा।





