संस्कृति और शिक्षा की उपेक्षा’: छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी की बदहाली पर उठे गंभीर सवाल, 8 साल से ठप है प्रकाशन
भूतबंगले में तब्दील हो रहा भवन: वर्ष 2017 में लोकार्पित इस अकादमी के भवन की हालत लगातार खराब होती जा रही है। चारों तरफ जंगल और झाड़ियां उग आई हैं। शाम ढलते ही यह पूरा परिसर एक भूतबंगले जैसा नजर आने लगता है।
रायपुर प्रवक्ता.कॉम 9 सितंबर 2026
रायपुर। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय परिसर, रायपुर स्थित ‘छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी’ का भवन आज अपनी उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता पर आंसू बहा रहा है। वर्ष 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उच्च शिक्षा मंत्री प्रेम प्रकाश पांडेय की मौजूदगी में लोकार्पित यह संस्थान आज शाम ढलते ही एक अघोषित “भूतबंगले” में तब्दील हो जाता है।
प्राकृतिक सुंदरता और जंगलों से आच्छादित इस परिसर की हालत पिछले कई वर्षों से कमोबेश ऐसी ही बनी हुई है। शोधार्थियों, विद्यार्थियों और संस्कृति प्रेमियों के लिए ज्ञान का केंद्र रहने वाला यह संस्थान आज तालेबंदी और फांकाकसी के कगार पर पहुंच गया है।
क्या है हिंदी ग्रंथ अकादमी?

1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कोठारी आयोग की सिफारिशों के तहत भारत भर में प्रादेशिक भाषाओं में उच्च शिक्षा की सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ग्रंथ अकादमियों का गठन हुआ था।
स्थापना:
छत्तीसगढ़ गठन के बाद जनवरी 2006 में ‘छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी’ की स्थापना की गई (पंजीयन 6 जून 2006)।
संरचना:

उच्च शिक्षा मंत्री इसके पदेन अध्यक्ष और स्कूल शिक्षा मंत्री इसके उपाध्यक्ष होते हैं। इसका प्रशासनिक संचालन एक पूर्णकालिक/प्रभारी संचालक के हाथों में होता है।
अकादमी के मुख्य कार्य क्या हैं?
उच्च शिक्षा के लिए पुस्तकें:
विश्वविद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन स्तर पर कला, विज्ञान, वाणिज्य और अन्य विषयों की उच्च स्तरीय पाठ्य-सामग्री व संदर्भ ग्रंथ हिंदी में उपलब्ध कराना।
स्थानीय इतिहास और संस्कृति का संरक्षण: छत्तीसगढ़ के इतिहास, जनजातीय जीवन, लोक साहित्य, भाषाओं और महान विभूतियों पर शोधपरक पुस्तकों का प्रकाशन करना।
कम कीमत पर मानक पुस्तकें:
सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को अनुदानित (रियायती) दरों पर प्रामाणिक सामग्री प्रदान करना।
लेखकों को प्रोत्साहन:
स्थानीय शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और विद्वानों की रचनाओं को प्रकाशित कर उन्हें यथोचित रॉयल्टी देना।
वर्तमान स्थिति: 8 साल से एक भी नई पुस्तक नहीं छपी
प्रकाशन ठप:
पिछले लगभग आठ वर्षों (वर्ष 2016-17 के बाद) से अकादमी से एक भी नई पुस्तक प्रकाशित नहीं हो सकी है।
लाखों की पुस्तकें डंप:
संस्थान के स्टोर रूम में लाखों रुपये मूल्य की महत्वपूर्ण पुस्तकें उचित रख-रखाव और विपणन के अभाव में धूल फांक रही हैं और दीमक का शिकार हो रही हैं।
कर्मचारियों की फांकाकसी:
अकादमी में वर्षों से पदस्थ इक्के-दुक्के मानदेय (दैनिक वेतन भोगी/संविदा) कर्मचारी लंबे समय से वेतन और भविष्य के अनिश्चितता के कारण आर्थिक तंगी में जीवन जीने को मजबूर हैं।
शोधार्थियों को निराशा:
विश्वविद्यालय में शोध करने वाले छात्रों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों को अब यहां से खाली हाथ लौटना पड़ता है।
संस्थान की दुर्दशा के लिए कौन है जिम्मेदार?

उच्च शिक्षा विभाग और राजनीतिक नेतृत्व:
अकादमी के पदेन अध्यक्ष स्वयं राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री होते हैं। लगातार बदलती सरकारों और मंत्रियों ने इस संस्थान की सुध नहीं ली। बोर्ड की नियमित बैठकें न होना और विज़न की कमी इसके मुख्य कारणों में से एक है।
नौकरशाही और प्रशासनिक उदासीनता:
संस्थान में स्थाई संचालक और पर्याप्त प्रशासनिक स्टाफ की नियुक्ति न होना। अकादमी को आत्मनिर्भर बनाने या इसके विपणन (Marketing) नेटवर्क को सुधारने के लिए अधिकारियों द्वारा कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बनाई गई।
बजट और वित्तीय अनुदान की कमी:
राज्य सरकार द्वारा अकादमी को मिलने वाले अनुदान और बजट आवंटन में लगातार कटौती की गई, जिससे नए शोध कार्यों, अनुवादों और प्रकाशनों पर पूरी तरह विराम लग गया।
विश्वविद्यालय प्रशासन का ढुलमुल रवैया:
यद्यपि यह भवन पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय परिसर में स्थित है, लेकिन परिसर के भीतर मौजूद इस महत्वपूर्ण इकाई की बदहाली पर विवि प्रशासन ने भी शासन का ध्यान आकर्षित करने के गंभीर प्रयास नहीं किए।
निष्कर्ष:
जिस छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी को राज्य की बौद्धिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहचान का स्तंभ होना चाहिए था, वह आज केवल एक जर्जर ढांचे के रूप में खड़ा है। यदि राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग ने जल्द ही इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो छत्तीसगढ़ के इतिहास और ज्ञान-परंपरा को सहेजने वाला यह इकलौता संस्थान पूरी तरह से इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएगा।






