कर्मचारियों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (बिलासपुर) के दो बड़े फैसले: एक तरफ मिली राहत, दूसरी तरफ झटका
रायपुर/बिलासपुर/प्रवक्ता.कॉम/08=अक्टूबर
:कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन और इंक्रीमेंट से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अक्टूबर के पहले हफ्ते में दो अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं। जहां शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने स्थायी किए गए दैनिक वेतनभोगियों के पेंशनरी इंक्रीमेंट के पक्ष में निर्णय देकर राहत दी, वहीं छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जनपद पंचायत कर्मियों की पेंशन मांग याचिका को खारिज कर दिया है।
1. सुप्रीम कोर्ट: “दैनिक वेतनभोगी रहे कर्मचारियों का वार्षिक इंक्रीमेंट नहीं रोका जा सकता”•
फैसले का सार: सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जिन कुशल दैनिक वेतनभोगियों को सरकार ने बाद में नियमित (Permanent) कर दिया था, उन्हें रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले नोशनल व वास्तविक सालाना वेतन वृद्धि (Annual Increment) से वंचित नहीं किया जा सकता।•
वर्किंग: कोर्ट ने दोटूक कहा कि शुरुआत में दैनिक वेतनभोगी होना पेंशनरी लाभ काटने का आधार नहीं बन सकता।• निर्देश: संबंधित विभागों को निर्देश दिया गया कि 30 दिनों के भीतर ऐसे कर्मचारियों का संशोधित पेंशन निर्धारण कर एरियर का भुगतान किया जाए।

2. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (बिलासपुर): “जनपद पंचायत कर्मी सरकारी सेवक नहीं, पेंशन का वैधानिक हक नहीं”•
फैसले का सार: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने प्रदेश के विभिन्न जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों की 24 याचिकाओं को एक साथ खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों की तरह मासिक पेंशन देने की मांग की थी।•
अदालत की टिप्पणी: हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंचायत विभाग के स्थानीय निकाय कर्मचारी सीधे तौर पर राज्य शासन के सिविल सेवक (Government Servants) नहीं हैं। उनके सेवा नियमों में अंशदायी भविष्य निधि (CPF/EPF) की व्यवस्था है, न कि सिविल सर्विस पेंशन की।• अधिकार क्षेत्र की सीमा: कोर्ट ने कहा कि नीति बनाना और पेंशन योजना लागू करना कार्यपालिका व विधायिका का काम है। संवैधानिक अदालतें न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के जरिए सरकार को नई पेंशन योजना बनाने का आदेश नहीं दे सकतीं।






