बड़ी खबर: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की परिभाषा तय करने के लिए बनाई हाई-पावर एक्सपर्ट कमेटी

प्रवक्ता.कॉम 3 जून 2026
नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला (Aravalli Hill Range) के संरक्षण और उसकी सटीक सीमाएं तय करने के लिए आज एक बड़ा आदेश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की अरावली रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा के लिए एक हाई-पावर एक्सपर्ट कमेटी (HPC) का गठन किया है।
इस कमेटी की कमान कंचन देवी (महानिदेशक, भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद – ICFRE) को सौंपी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पैनल को 31 अगस्त, 2026 तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।

मुख्य बिंदु और कोर्ट की चिंताएं:
पर्यावरण बनाम खनन का खेल: कोर्ट ने चिंता जताई कि केंद्र सरकार की पिछली रिपोर्ट में अरावली के दायरे को सिर्फ 500 मीटर के अंतराल वाले पहाड़ों तक सीमित करने का प्रस्ताव था। इससे कई हिस्से सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाते और वहां धड़ल्ले से खनन (Mining) की इजाजत मिल जाती।
100 मीटर की ऊंचाई का गणित: राजस्थान के 12,081 पहाड़ों में से केंद्र की रिपोर्ट में सिर्फ 1,048 पहाड़ों को ही 100 मीटर से ऊंचा मानकर अरावली का हिस्सा बताया गया था। सुप्रीम कोर्ट अब इस बात की वैज्ञानिक जांच करवाएगा कि क्या यह दावा सच है या इसके पीछे कम ऊंचाई वाले पहाड़ों को कानूनी सुरक्षा से बाहर करने की कोशिश है।
निष्पक्ष वैज्ञानिक जांच: कोर्ट ने कहा कि अरावली इकोसिस्टम की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और वैज्ञानिक मूल्यांकन होना बेहद जरूरी है। इस कमेटी में वानिकी, भूविज्ञान (Geology), और पर्यावरण के दिग्गज विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।
आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) मामलों पर कोर्ट की आत्म-समीक्षा: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि भारत में कई बार अदालती हस्तक्षेप (Judicial Interference) की वजह से मध्यस्थता के मामले सालों-साल लटके रहते हैं। कोर्ट ने कहा कि जजों को बेवजह मामलों में दखल देने से बचना चाहिए ताकि देश में व्यापार करना आसान (Ease of Doing Business) हो सके।
25 साल पुराने केस में बड़ी राहत: कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी पर सिर्फ ‘सामान्य या सामूहिक आरोप’ लगाकर 25 साल तक केस नहीं चलाया जा सकता। ठोस सबूतों के अभाव में कोर्ट ने ओडिशा के एक फॉरेस्ट रेंजर अधिकारी को भ्रष्टाचार के पुराने मामले से बरी कर दिया ।





