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ब्लैकलिस्टेड कंपनी मेसर्स हरी स्टोर्स महाघोटाला: NMDC मुख्यालय में केस दर्ज कर जांच शुरू, तो जांजगीर-चांपा के ₹5 करोड़ के टेंडर पर छत्तीसगढ़ हेल्थ महकमा खामोश क्यों? क्या है इस चुप्पी का राज?

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रायपुर/हैदराबाद/जांजगीर-चांपा/कोंडागांव:

15 जुलाई 2026


छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग और नवरत्न सार्वजनिक उपक्रम एनएमडीसी (NMDC) लिमिटेड में कथित तौर पर कूटरचित दस्तावेजों और फर्जी शपथ पत्र के सहारे करोड़ों रुपये का टेंडर हथियाने के गंभीर आरोपों से घिरी फर्म मेसर्स हरी स्टोर्स, धमतरी का मामला अब बेहद संवेदनशील मोड़ पर आ गया है। इस पूरे प्रकरण में जहां एक ओर केंद्रीय उपक्रम ने त्वरित एक्शन लिया है, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक अमले की रहस्यमयी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

NMDC हैदराबाद मुख्यालय में केस रजिस्टर, जांच शुरू


विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले के दस्तावेजी साक्ष्य सामने आने के बाद एनएमडीसी (NMDC) लिमिटेड के चीफ विजिलेंस ऑफिस (हैदराबाद मुख्यालय) ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आधिकारिक केस रजिस्टर कर लिया है। एनएमडीसी सतर्कता विंग ने अपने क्षेत्राधिकार के तहत बचेली और किरन्दुल प्रोजेक्ट अस्पतालों में जारी लगभग ₹16.76 करोड़ के सीटी स्कैन टेंडरों की फाइलों की उच्च स्तरीय तकनीकी और प्रशासनिक जांच शुरू कर दी है। केंद्रीय उपक्रम द्वारा की गई इस त्वरित कार्यवाही ने यह साफ कर दिया है कि मामला बेहद संगीन है।

NMDC ने दायरा संभाला, लेकिन पूरे नेक्सस की चाबी छग हेल्थ डिपार्टमेंट के पास


प्रशासनिक जानकारों का साफ कहना है कि एनएमडीसी की जांच केवल उनके अपने प्रोजेक्ट्स और परिसरों तक सीमित रहेगी। लेकिन इस पूरे अंतर-विभागीय घोटाले के मूल उद्गम यानी कोंडागांव के कथित फर्जी पत्र और उसके आधार पर जांजगीर-चांपा में हुए ₹5 करोड़ के ‘Customized AMC/CMC व Modular OT’ टेंडर की व्यापक जांच करने का असली अधिकार और ज़िम्मेदारी छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य संचालनालय (Director Health) और स्वास्थ्य सचिव की है।
हेल्थ डिपार्टमेंट चाहे तो जांजगीर-चांपा और एनएमडीसी, दोनों ही मामलों को समेटते हुए पूरे राज्य स्तरीय रैकेट का पर्दाफाश कर सकता है। इसके बावजूद, जांजगीर-चांपा कलेक्टर, कोंडागांव कलेक्टर, हेल्थ डायरेक्टर और स्वास्थ्य सचिव को ई-मेल के जरिए विस्तृत शिकायत भेजे जाने के बाद भी अब तक छत्तीसगढ़ शासन की ओर से कोई जांच शुरू नहीं की गई है।

विधानसभा में गूंज रहा है ब्लैकलिस्टेड कंपनियों का मुद्दा, फिर भी अधिकारी मौन
यह प्रशासनिक सुस्ती और खामोशी इसलिए भी बड़े सवाल खड़े करती है क्योंकि वर्तमान में छत्तीसगढ़ विधानसभा के भीतर भी शासकीय विभागों में खासकर स्वास्थ्य विभाग में ब्लैकलिस्टेड और दागी कंपनियों को करोड़ों रुपये के टेंडर व दवा खरीदी सौंपने का मुद्दा पूरी गूंज के साथ उठ रहा है। विपक्ष से लेकर आम जनता तक इस पर जवाब मांग रही है।
ऐसे संवेदनशील माहौल में, जब विधानसभा पटल पर यह विषय गर्माया हुआ है, कोंडागांव, जांजगीर और दंतेवाड़ा में कथित प्रमाणित तौर पर ब्लैकलिस्टेड अवधि वाली फर्म को करोड़ों के संवेदनशील चिकित्सा कार्य सौंपे जाने के आरोपों पर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य महकमे की चुप्पी समझ से परे है।

बड़ा सवाल: यह महज लापरवाही है या कोई गहरी साजिश?
पब्लिक डोमेन और प्रशासनिक गलियारों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि आखिर स्वास्थ्य विभाग और कलेक्टर्स इस मामले को ठंडे बस्ते में क्यों डालना चाहते हैं?
जब एक ही शिकायत और उन्हीं दस्तावेजों पर NMDC जैसा बड़ा केंद्रीय संस्थान केस रजिस्टर कर जांच शुरू कर सकता है, तो छत्तीसगढ़ के कलेक्टर्स और हेल्थ डायरेक्टर को जांजगीर-चांपा वाले मामले की फाइल खोलने में क्या हिचक है?

क्या जांजगीर-चांपा में ब्लैकलिस्टेड अवधि के दौरान मिले ₹5 करोड़ के टेंडर की फाइलें खुलने से विभाग के ही कुछ बड़े चेहरों के बेनकाब होने का डर है?

क्या यह खामोशी किसी बड़े प्रशासनिक सिंडिकेट, आपसी मिलीभगत या किसी वित्तीय लेनदेन की ओर इशारा कर रही है?

गंभीर सवाल — अधिकारी खामोश क्यों हैं?
शासकीय टेंडरों में पारदर्शिता और जनता के टैक्स के पैसे का सही उपयोग लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली शर्त है। जब विधानसभा में ब्लैकलिस्टेड कंपनियों का मुद्दा गूंज रहा हो, तब अधिकारियों की यह खामोशी और जांच न करना खुद-ब-खुद संदेह के घेरे में आता है।
माननीय कलेक्टर्स और स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष नेतृत्व, इस कथित घोटाले की फाइलें दबाकर आप किसे संरक्षण दे रहे हैं? जनता और शासन की आंखों में धूल झोंककर करोड़ों के टेंडर हथियाने के इन गंभीर आरोपों पर छत्तीसगढ़ में आधिकारिक जांच कब शुरू होगी?

प्रवक्ता.कॉम (Pravakta.com) ने 6 जुलाई 2026 को इस विषय को प्रमुखता से उठाकर प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती पर प्रश्न चिन्ह लगाया था। मीडिया द्वारा इस तरह के मामलों को निरंतर उजागर करने से ही जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

प्रवक्ता.कॉम ने 6 जुलाई को उठाया था मुद्दा

​6 जुलाई की रिपोर्ट के बाद और आज (16 जुलाई) तक के 10 दिनों के अंतराल में स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:

​चुप्पी के संभावित कारण और विश्लेषण

प्रशासनिक प्रक्रिया बनाम तत्परता: अक्सर सरकारी विभागों में ‘प्रक्रिया’ का हवाला देकर फाइलों को दबाया जाता है। यदि एनएमडीसी ने जांच शुरू कर दी है, तो स्वास्थ्य विभाग के लिए यह एक ‘रेड फ्लैग’ होना चाहिए था। चुप्पी का एक कारण यह हो सकता है कि संबंधित अधिकारी इस मामले में अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रहे हों।

हितों का टकराव जब कोई कंपनी जो अन्यत्र ब्लैकलिस्टेड हो, उसे राज्य के स्वास्थ्य विभाग में बड़ा टेंडर मिलता है, तो यह मिलीभगत की ओर सीधा इशारा करता है। क्या उस टेंडर प्रक्रिया में किसी प्रभावशाली व्यक्ति या अधिकारी का संरक्षण है? यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

दबाव का अभाव: अक्सर जब तक उच्च न्यायालय या लोकायुक्त जैसे निकायों से कोई निर्देश नहीं आता, तब तक निचले स्तर के प्रशासनिक विभाग स्वतः संज्ञान लेने से बचते हैं।

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