छत्तीसगढ़ में 2008 शिक्षक पात्रता परीक्षा को टीईटी के समकक्ष मान्यता की मांग , मध्य प्रदेश में सरकार शिक्षकों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट गई

रायपुर/भोपाल: प्रवक्ता.कॉम
16 अगस्त 2026
देशभर में सेवारत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कड़े फैसलों के बाद अब राज्यों की नीतियां और प्रशासनिक कदम सुर्खियों में हैं। छत्तीसगढ़ में जहां हजारों शिक्षकों का भविष्य अधर में लटका हुआ है और सरकार की ओर से कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है, वहीं पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश ने अपने शिक्षकों को राहत दिलाने के लिए कानूनी रास्ता अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
छत्तीसगढ़ के शिक्षकों के मुख्य तर्क: क्यों मांग रहे हैं टीईटी के समकक्ष मान्यता?
सहायक शिक्षकों और शिक्षक संघों द्वारा 2008 की परीक्षा को टीईटी के समकक्ष माने जाने के पीछे प्रमुख तर्क दिए जा रहे हैं:
समान चयन प्रक्रिया और पारदर्शिता:
शिक्षकों का तर्क है कि वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) द्वारा आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा राज्यव्यापी स्तर पर, पूरी तरह पारदर्शी और नियमानुसार आयोजित की गई थी।
वैध नियुक्ति:
उनका कहना है कि उन्होंने इसी परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद नियमों के तहत सेवा में नियुक्ति प्राप्त की थी और वे पिछले कई वर्षों से पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा से अपने शैक्षणिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं।
पदोन्नति और सेवालाभ में बाधा: शिक्षकों का मुख्य दर्द यह है कि वर्तमान में टीईटी की अनिवार्यता लागू होने के कारण उनकी पदोन्नति , क्रमोन्नति और अन्य सेवाकालीन लाभों में लगातार कानूनी व प्रशासनिक अड़चनें आ रही हैं, जिससे उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है।
विधानसभा आंकड़े और दायरा:
विधानसभा में दिए गए हालिया आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में लगभग 80,500 शिक्षक टीईटी अनिवार्यता के दायरे में आते हैं।
सरकार की खामोशी:
शिक्षक संघों और हजारों शिक्षकों द्वारा लगातार यह मांग की जा रही है कि वर्ष 2008 की परीक्षा को टीईटी के समकक्ष माना जाए, लेकिन छत्तीसगढ़ शासन इस मामले पर अभी तक खामोश नजर आ रहा है, जिससे शिक्षकों में रोष है।
मध्य प्रदेश सरकार कब और क्यों गई सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख:
सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 और उसके बाद के फैसलों में स्पष्ट कर दिया था कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए सेवारत शिक्षकों हेतु टीईटी पास करना अनिवार्य है। हालांकि, अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए परीक्षा पास करने की समयसीमा बढ़ाई है।
प्रमोशन और शिक्षकों का संकट:
इस अनिवार्यता के चलते मध्य प्रदेश में भी हजारों शिक्षकों के प्रमोशन और सेवा पर संकट आ गया।
मध्यप्रदेश सरकार का कानूनी कदम:
सरकार की दलील:
इसी संकट से निपटने के लिए मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका और पूरक याचिका दायर की। मध्य प्रदेश सरकार ने कोर्ट में यह मजबूत तर्क दिया है कि साल 2005 से 2009 के बीच (विशेषकर 2005 से 2008 के दौरान) जिन शिक्षकों की भर्तियां सरकारी चयन परीक्षाओं के माध्यम से हुई थीं, उन्हें दोबारा टीईटी परीक्षा देने के लिए बाध्य न किया जाए।
एमपी सरकार का कहना है कि उस वक्त की पात्रता परीक्षा का पैटर्न भी टीईटी जैसा ही था, इसलिए उस अवधि में नियुक्त हुए करीब 70,000 से 75,000 शिक्षकों को टीईटी से छूट दी जाए ताकि उनके प्रमोशन और नौकरी का रास्ता साफ हो सके।
अब छत्तीसगढ़ के शिक्षकों की उम्मीदें
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अपने राज्य के शिक्षकों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में मजबूत पैरवी किए जाने के बाद अब छत्तीसगढ़ के लगभग 80,500 प्रभावित शिक्षकों की निगाहें भी छत्तीसगढ़ सरकार पर टिक गई हैं। शिक्षक संगठन लगातार मांग कर रहे हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार भी मध्य प्रदेश की तर्ज पर आगे आए और इस गंभीर विषय पर उच्चस्तरीय समिति गठित कर जल्द से जल्द कोई सकारात्मक कदम उठाए।





