जीराफूल – छत्तीसगढ़ की माटी की वह सुगंध, जो अब देश के बाजार में बिखेरेगी अपनी चमक
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कृषि पहचान और माटी की सौंधी खुशबू अब देश के बाजारों में अपनी विशेष छाप छोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। बलरामपुर जिले के ग्राम चांगरो में उपजाया जाने वाला अनमोल 'जीराफूल चावल' आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है,
रायपुर/ बलरामपुर छत्तीसगढ़
विजय सिंह ठाकुर
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कृषि पहचान और माटी की सौंधी खुशबू अब देश के बाजारों में अपनी विशेष छाप छोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। बलरामपुर जिले के ग्राम चांगरो में उपजाया जाने वाला अनमोल ‘जीराफूल चावल’ आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है, लेकिन अब जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की पहल से इसे एक नई संगठित दिशा मिलने जा रही है। पारंपरिक खेती के संरक्षण और किसानों की आर्थिक समृद्धि का यह नया अध्याय छत्तीसगढ़ के कृषि इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।
जीरे जैसे महीन दाने और मनमोहक सुगंध
जीराफूल महज एक फसल नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक और कृषि विरासत का प्रतीक है। यह एक पारंपरिक, सुगंधित और छोटे दाने वाली धान की ऐसी दुर्लभ किस्म है, जिसके पतले और सुडौल दाने ठीक जीरे की तरह प्रतीत होते हैं, और इसी विशेषता के चलते इसका नाम ‘जीराफूल’ पड़ा।
अपनी प्राकृतिक मिठास, मनमोहक महक, हल्केपन और सुपाच्य गुणों के कारण यह खाद्य प्रेमियों की पहली पसंद बना हुआ है। बाजार में इसकी मांग और विशिष्टता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह प्रीमियम चावल बाजार में 100 से 120 रुपये प्रति किलो तक के मूल्य पर बिकता है। अपनी इसी अनूठी खूबियों के दम पर मार्च 2019 में इसे प्रतिष्ठित जीआई टैग (GI Tag) से भी नवाजा जा चुका है।
रासायनिक खेती से तौबा, जैविक पद्धति पर जोर
चांगरो गांव में इन दिनों बदलाव की एक बयार बह रही है। माटी की सेहत और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए किसानों को रासायनिक खादों और कीटनाशकों से दूरी बनाने तथा पूरी तरह जैविक पद्धति अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। प्रशासनिक अमले और जनप्रतिनिधियों ने खुद खेतों की मेड़ पर पहुंचकर किसानों के साथ जमीन पर बैठकर संवाद किया और उनके पारंपरिक अनुभवों को साझा किया।
30 गांवों तक विस्तार और महिला सशक्तिकरण की नई राह

प्रशासन की नई कार्ययोजना के तहत जीराफूल की खेती को केवल चांगरो तक सीमित न रखकर, शंकरगढ़ क्षेत्र के लगभग 30 गांवों तक इसका दायरा बढ़ाया जा रहा है। इस पूरी मुहिम की सबसे बड़ी ताकत यहां की मातृशक्ति बन रही है। चांगरो में इस खेती से 10 स्व-सहायता समूह जुड़े हुए हैं, जिनमें 12 से 15 महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है।
इन समूहों को शंकरगढ़ स्थित ‘आत्मनिर्भर बलरामपुर किसान उत्पादक संगठन’ से जोड़ने की पुख्ता तैयारी है, जिससे किसानों और महिलाओं को रियायती दरों पर गुणवत्तापूर्ण कृषि सामग्री और आधुनिक सेवाएं मिल सकें।
ब्रांडिंग और प्रसंस्करण के आधुनिक आयाम

स्थानीय स्तर पर ही किसानों को उनकी फसल का उचित दाम मिले, इसके लिए विशेष कार्ययोजना पर काम शुरू हो गया है। चांगरो के इस सुगंधित चावल की प्रभावी ब्रांडिंग के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर ही प्रसंस्करण की सुविधा मुहैया कराने की योजना है। इसके तहत राइस मिल के साथ-साथ पारंपरिक लकड़ी की ढेंकी के आधुनिक और उन्नत स्वरूप ‘इलेक्ट्रिक ढेंकी’ की स्थापना पर भी विचार किया जा रहा है।
समृद्धि की नई किरण
चांगरो के किसानों की पीढ़ियों पुरानी मेहनत और लगन को अब एक नई पहचान मिलने जा रही है। जैविक खेती, आधुनिक ब्रांडिंग और बेहतर विपणन के इस अनूठे त्रिवेणी संगम से न केवल किसानों की आय में क्रांतिकारी वृद्धि होगी, बल्कि स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं भी आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगी।






