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13 मई को सुप्रीम कोर्ट में टीईटी प्रकरण पर दिग्गज वकील कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी पी विल्सन सहित 20 से अधिक वरिष्ठ वकील रखेंगे शिक्षकों का पक्ष TET से मिलेगी आजादी या नहीं तय होगा?

सुप्रीम कोर्ट में 13 मई 2026 को शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता से जुड़ी पुनर्विचार याचिकाओं (Review Petitions) पर होने वाली सुनवाई बेहद निर्णायक है। यह मामला देश भर के लगभग 25 लाख शिक्षकों के भविष्य से जुड़ा है। ​इस सुनवाई से क्या-क्या संभावित परिणाम निकल सकते हैं, उसके आधार पर यह विशेष समाचार रिपोर्ट



​नई दिल्ली/रायपुर:
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की बेंच 13 मई को ‘ओपन कोर्ट’ में उन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी, जो इन-सर्विस शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य करने के पुराने फैसले को चुनौती देती हैं।
क्या हो सकता है इस सुनवाई में?
​अनिवार्यता पर स्टे (Stay): यदि शिक्षक पक्ष के वकील अदालत को यह समझाने में सफल रहते हैं कि RTE लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों पर यह नियम थोपना उनके अधिकारों का हनन है, तो कोर्ट इस नियम के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक (Stay) लगा सकता है।
​कट-ऑफ डेट में बदलाव:

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कोर्ट यह स्पष्ट कर सकता है कि 23 अगस्त 2010 (NCTE नोटिफिकेशन की तारीख) या 29 जुलाई 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को TET से पूरी तरह छूट दी जाए।
​अनुभव को प्राथमिकता:

वकीलों का एक बड़ा तर्क यह है कि 10-20 साल का अनुभव रखने वाले शिक्षकों की योग्यता को एक परीक्षा (TET) से नहीं आंका जाना चाहिए। कोर्ट उनके अनुभव को ‘प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन’ के समकक्ष मान सकता है।
​राज्यों को छूट:

अलग-अलग राज्यों (जैसे छत्तीसगढ़, यूपी, एमपी) की भौगोलिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट राज्यों को अपने स्तर पर शिथिलता (Relaxation) देने का अधिकार दे सकता है।
सुनवाई क्यों है खास?
​आमतौर पर पुनर्विचार याचिकाएं जजों के चैंबर में सुनी जाती हैं, लेकिन इस बार कोर्ट ने ‘ओपन कोर्ट हियरिंग’ की अनुमति दी है। इसका मतलब है कि वकीलों को जजों के सामने मौखिक बहस करने का पूरा मौका मिलेगा, जो शिक्षकों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
​प्रमुख तर्क जो रखे जाएंगे:
​पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect): कानून भविष्य से लागू होना चाहिए, पुरानी नियुक्तियों पर नहीं।
​NCTE के पुराने नियम: 2011 से पहले की नियुक्तियों में TET की शर्त नहीं थी।
​शिक्षकों की कमी: यदि लाखों शिक्षकों को TET न होने के कारण हटाया गया, तो स्कूल “शिक्षक विहीन” हो जाएंगे।
​13 मई की शाम तक यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि क्या इन-सर्विस शिक्षकों को ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ के डर से राहत मिलेगी या उन्हें दो साल के भीतर परीक्षा पास करनी ही होगी।

दिग्गज वकील और शिक्षक संगठन रखेंगे पक्ष
​ सुप्रीम कोर्ट में 13 मई 2026 को होने वाली TET अनिवार्यता मामले की सुनवाई (Review Petitions) में देश के कई दिग्गज वकील और विभिन्न राज्यों के शिक्षक संगठन अपना पक्ष रखेंगे। चूंकि कोर्ट ने ‘ओपन कोर्ट हियरिंग’ की अनुमति दी है, इसलिए यह बहस काफी विस्तृत और महत्वपूर्ण होगी।

​प्रमुख वकील (Advocates)
​सीनियर एडवोकेट पी. विल्सन (P. Wilson): तमिलनाडु राज्य की ओर से पक्ष रखेंगे। उन्होंने पहले भी तर्क दिया है कि RTE कानून को ‘भूतलक्षी प्रभाव’ (Retrospective effect) से लागू करना गलत है।
​एडवोकेट साबरीश सुब्रमण्यम (Sabarish Subramanium): ये भी तमिलनाडु सरकार की ओर से कानूनी टीम का हिस्सा हैं।
​एडवोकेट टोमी चाको (Tomy Chacko): ये ‘देशीय अध्यापक परिषद’ (NTU केरल) का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इन्होंने ही विशेष रूप से ‘ओपन कोर्ट हियरिंग’ की मांग की थी ताकि हजारों शिक्षकों की शिकायतों को सीधे सुना जा सके।
​सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी: संभावना है कि विभिन्न राज्यों के शिक्षक संघों की ओर से ये वरिष्ठ वकील भी बहस का हिस्सा बनें (अक्सर ऐसे बड़े मामलों में शिक्षक संघ इन्हें हायर करते हैं)।
​सॉलिसिटर जनरल (भारत सरकार): केंद्र सरकार और NCTE (राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद) का पक्ष रखने के लिए सरकारी वकील मौजूद रहेंगे, जो TET की अनिवार्यता के पक्ष में तर्क दे सकते हैं।
​प्रमुख संगठन
​इस मामले में लगभग 45 पुनर्विचार याचिकाएं एक साथ सुनी जा रही हैं।
​विभिन्न राज्य सरकारें: तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसी सरकारों ने याचिकाएं दायर की हैं। इनका मुख्य तर्क यह है कि उनके राज्यों में प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के कारण छूट (Relaxation) मिलना जरूरी है।
​देशीय अध्यापक परिष : केरल आधारित यह संगठन शिक्षकों के हितों के लिए ‘इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन’ (IA) के जरिए पक्ष रख रहा है।

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