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हाईकोर्ट ने फिर प्रभारी बीईओ के पद से व्याख्याता को हटाया 10 जून को शासन के द्वारा जारी आदेश को कहा नियम विरुद्ध बार बार क्यों कोर्ट में हारना चाहती है सरकार क्या सेटिंग है इसके पीछे ? समझिए पूछा खेल

कई बार अनेक मामलों में कोर्ट के द्वारा इस तरह के आदेश को रद्द करने के बाद भी स्कूल शिक्षा विभाग आखिर व्याख्याताओं की नियुक्ति बीइओ के पद पर क्यों करता है इसके पीछे का सेटिंग क्या है क्यों सरकार बार बार कोर्ट में हारना चाहती है

रायपुर प्रवक्ता.कॉम 25 जून 2026

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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्कूल शिक्षा विभाग में नियमों को ताक पर रखकर जूनियर अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों का प्रभार सौंपने के मामले में एक कड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने अंबागढ़ चौकी/ डोंगरगांव में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) के पद पर एक जूनियर व्याख्याता (Lecturer) की नियुक्ति से जुड़े विवादित सरकारी आदेश को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया है।

​यह फैसला हाई कोर्ट के माननीय न्यायाधीश श्री बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता जयंत साहू द्वारा दायर रिट याचिका (WPS No. 4589 of 2026) पर सुनवाई करते हुए दिया।

क्या था पूरा मामला?

​याचिकाकर्ता जयंत साहू (उम्र लगभग 51 वर्ष), जो कि मूल रूप से सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (ABEO – प्रशासनिक संवर्ग) के पद पर कार्यरत हैं, उन्हें फरवरी 2026 में डोंगरगांव (जिला राजनांदगांव) में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) का प्रभार सौंपा गया था।

​विवाद तब शुरू हुआ जब स्कूल शिक्षा विभाग ने 10 जून 2026 को एक आदेश जारी कर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भोलापुर (राजनांदगांव) के व्याख्याता (शिक्षण संवर्ग) श्री कमलेश्वर कुमार देवांगन को जयंत साहू के स्थान पर अंबागढ़ चौकी का नया ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) नियुक्त कर दिया।

नियमों की अनदेखी पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

​याचिकाकर्ता के वकील (श्री जितेंद्र पाली और अनिकेत वर्मा) ने कोर्ट के सामने छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षणिक एवं प्रशासनिक संवर्ग) भर्ती और पदोन्नति नियम, 2026 का हवाला दिया। उन्होंने दलील दी कि:

  • ​नियमों के तहत BEO के 75% पद सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों (ABEO) की पदोन्नति से भरे जाने का प्रावधान है।
  • ​जिन्हें प्रभार दिया गया (कमलेश्वर कुमार देवांगन), वे शिक्षण संवर्ग से आते हैं और याचिकाकर्ता से काफी जूनियर हैं। इसके अलावा वे ABEO के कैडर में भी शामिल नहीं हैं।

​राज्य शासन के वकील ने प्रशासनिक अनिवार्यताओं का हवाला देते हुए इस फैसले को सही ठहराने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया।

हाई कोर्ट का आदेश

​हाई कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों और नियमों को परखने के बाद माना कि याचिकाकर्ता से जूनियर और गैर-कैडर व्यक्ति को नियमों के खिलाफ जाकर पद सौंपना पूरी तरह से गलत है। जस्टिस बिभु दत्त गुरु की पीठ ने 24 जून 2026 को सुनाए फैसले में 10 जून 2026 के उस विवादित सरकारी आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता की रिट याचिका को स्वीकार (Allowed) कर लिया।

​इस फैसले के बाद अब प्रशासनिक विभागों में कैडर और सीनियरिटी को दरकिनार कर चहेतों या जूनियरों को प्रभार सौंपने की परिपाटी पर बड़ा अंकुश लगने की उम्मीद है।

इस तरह के नियम विरुद्ध पदस्थापना के पीछे का सेटिंग को समझिए

स्कूल शिक्षा विभाग में नियमों (जैसे कि छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा भर्ती और पदोन्नति नियम, 2026) को दरकिनार कर बार-बार जूनियर व्याख्याताओं को ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) का प्रभार देने और फिर कोर्ट से फटकार खाने के पीछे कोई एक वजह नहीं है। इसके पीछे प्रशासनिक, राजनैतिक और व्यवस्थागत कई ऐसे कारण (जिन्हें आम बोलचाल में ‘सेटिंग’ या ‘लूपहोल्स’ कहा जाता है) काम करते हैं, जिनकी वजह से विभाग बार-बार कोर्ट में हारने के बाद भी वही गलतियां दोहराता है:

​1. ‘मूल पद’ बनाम ‘प्रभारी’ (In-charge) व्यवस्था का खेल

​विभाग अक्सर कोर्ट में यह दलील देता है कि वे किसी व्याख्याता को BEO के पद पर स्थायी रूप से प्रमोट (पदोन्नत) नहीं कर रहे हैं, बल्कि सिर्फ ‘कार्यवाहक’ या ‘प्रभारी’ के तौर पर काम सौंप रहे हैं। प्रशासनिक शब्दावली में इसे “अस्थायी व्यवस्था” या “प्रशासनिक आवश्यकता” कहा जाता है। विभाग इसी लूपहोल का फायदा उठाकर अपने पसंदीदा अधिकारियों को मलाईदार पदों पर बैठा देता है, भले ही कोर्ट बाद में उसे रद्द कर दे।

​2. मलाईदार पद और ‘पसंदीदा’ ट्रांसफर-पोस्टिंग

​BEO (ब्लॉक शिक्षा अधिकारी) का पद ब्लॉक स्तर पर स्कूली शिक्षा का सबसे पावरफुल प्रशासनिक पद होता है। पूरे ब्लॉक के शिक्षकों का वेतन, फंड, स्कूलों की मॉनिटरिंग और प्रशासनिक कमान इसी पद के पास होती है। यही कारण है कि इस पद पर आने के लिए भारी खींचतान और “राजनैतिक रसूख” (सचिवालय या मंत्रियों के स्तर पर पैरवी) का इस्तेमाल होता है। कई बार नियमों को जानने के बावजूद, राजनैतिक दबाव या व्यक्तिगत साठगांठ के कारण अधिकारी ऐसे आदेश जारी कर देते हैं।

सरकारी खजाने पर बोझ, अधिकारियों पर कोई व्यक्तिगत कार्रवाई नहीं

​सरकार या विभाग के बार-बार कोर्ट में हारने का सबसे बड़ा कारण यह है कि गलत आदेश जारी करने वाले अधिकारी की जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं होता। कोर्ट केस लड़ने का पूरा खर्च, वकीलों की फीस और हर्जाना जनता के टैक्स के पैसे (सरकारी खजाने) से जाता है। जब तक नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले अधिकारियों पर व्यक्तिगत आर्थिक दंड या उनकी सीआआर (CR) खराब करने जैसी कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक वे ऐसे नियमों के विरुद्ध आदेश जारी करने से नहीं डरेंगे।

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