मईके की राह, फुलेरा की छांव: जानिए छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कैसे मनाया जाता है ‘तीजा’
आज है महिलाओं का महापर्व तीज: छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की अनूठी लोक परंपरा , छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में तीजा की धूम: अखंड सौभाग्य और लोक परंपरा का महापर्व निराला है तीजा का उल्लास: करू भात की मिठास और निर्जला व्रत से महकी लोक संस्कृति पति की दीर्घायु का तप: छत्तीसगढ़ और एमपी में आस्था और सोलह श्रृंगार के साथ मनाया गया तीज

रायपुर प्रवक्ता. कॉम
तीज केवल एक व्रत या त्योहार नहीं, बल्कि मध्य भारत—विशेषकर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश—की सांस्कृतिक चेतना और लोक परंपराओं की आत्मा है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह ‘हरतालिका तीज’ का पर्व अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और परिवार की समृद्धि का महापर्व है। दोनों राज्यों में इस पर्व को अपार श्रद्धा, उमंग और सामाजिक समरसता के साथ मनाया जाता है।
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का आधार: ‘तीजा’
छत्तीसगढ़ में तीज को ‘तीजा’ कहा जाता है। यहाँ की लोक परंपराओं में इस पर्व का महत्व अत्यधिक गहरा है:
मईके की राह और ‘तीजा लिवाने’ की परंपरा: छत्तीसगढ़ में तीजा से कुछ दिन पहले ही बेटियों को उनके मायके (मईके) लाने का रिवाज है। भाई या पिता विशेष रूप से अपनी बहन-बेटी को लिवाने (लेने) ससुराल जाते हैं।
करू भात की रस्म: व्रत के एक दिन पहले (द्वितीया को) ‘करू भात’ (करेले की सब्जी और भात) खाने की परंपरा है। माना जाता है कि कड़वे भोजन के सेवन से शरीर शुद्ध होता है और निर्जला व्रत रखने की क्षमता मिलती है।
ठेठरी-खुरमी का स्वाद: तीजा के स्वागत में हर घर से छत्तीसगढ़ी पकवानों जैसे ठेठरी, खुरमी, अनरसा और अरीसा पीठा की सोंधी सुगंध आने लगती है।
फुलेरा और शिव पूजा: पूजा के लिए बाँस की टोकरी में फूलों और पत्तियों की सुंदर झांकी बनाकर ‘फुलेरा’ सजाया जाता है। रात भर जागकर (जागरण) महिलाएँ मिट्टी के शिवलिंग और माता पार्वती की प्रतिमा बनाकर कथा सुनती हैं और छत्तीसगढ़ी तीजा गीत गाती हैं।
मध्य प्रदेश में तीज का उल्लास
मध्य प्रदेश के मालवा, बुंदेलखंड और बघेलखंड अंचलों में भी तीज का पर्व बड़े ही नियम और निष्ठा के साथ संपन्न होता है:
- निर्जला और निराहार कठिन तप: महिलाएँ 24 घंटे से अधिक समय तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए यह कठिन व्रत रखती हैं।
- सोलह श्रृंगार और मेंहदी: इस दिन सुहागिन महिलाएँ नए वस्त्र (विशेषकर लाल या हरी साड़ी) पहनकर, हाथों में मेंहदी रचाकर और सोलह श्रृंगार करके देवी पार्वती और भगवान शिव का पूजन करती हैं।
- पारंपरिक लोकगीत और झूला: बुंदेलखंड और मालवा में महिलाएँ एक स्थान पर एकत्र होकर पारंपरिक तीजा गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं और ढोलक की थाप पर लोकनृत्य करती हैं।
धार्मिक एवं सामाजिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए जंगल में बालू रेत का शिवलिंग बनाकर यह कठिन तपस्या की थी।
यह महापर्व जहाँ एक ओर दांपत्य जीवन में प्रेम और समर्पण का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह मायके और ससुराल के रिश्तों को मजबूती प्रदान करता है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की समृद्ध लोक परंपराओं को जीवंत रखने में इस पर्व का विशेष योगदान है।





