शोक समाचार: छत्तीसगढ़ की लोक कला का एक युग समाप्त, पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन

रायपुर प्रवक्ता .कॉम 5 जुलाई 2026
जिस जादुई और ओजस्वी स्वर ने महाभारत की गाथाओं को जन-जन तक पहुँचाया, वह स्वर आज सदा के लिए मौन हो गया। छत्तीसगढ़ की माटी की बेटी और पंडवानी लोक विधा को विश्व पटल पर स्थापित करने वाली महान साधिका, पद्म विभूषण श्रीमती तीजन बाई जी का निधन हो गया है। उनके जाने से न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत को एक अपूरणीय क्षति पहुँची है।
विश्वभर में दिलाई छत्तीसगढ़ को नई पहचान

श्रीमती तीजन बाई ने अपने अद्भुत गायन, जीवंत अभिनय और अद्वितीय ओजस्वी प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ की लोककला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई और गौरवशाली पहचान दिलाई। हाथ में तंबूरा पकड़े जब वे मंच पर महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करती थीं, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि ग्रामीण अंचलों से निकली प्रतिभा किसी भी सीमा या रूढ़ियों की मोहताज नहीं होती।
सम्मान और पुरस्कारों का सफर
उनकी कला साधना के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा:
पद्म श्री
पद्म भूषण
पद्म विभूषण
सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जीवित रहेंगी यादें
तीजन बाई जी का संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायी जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक की तरह काम करेगा। भारतीय लोकसंस्कृति के विकास में उनका योगदान एक अमूल्य धरोहर है, जो इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा।
उनके निधन पर कला जगत, राजनीतिक गलियारों और उनके लाखों प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है। देश की इस महान कला साधिका को भावभीनी श्रद्धांजलि।
पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई जी का निधन रायपुर (छत्तीसगढ़) के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में हुआ।
वे पिछले काफी समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं और रायपुर एम्स के अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली।
श्रीमती तीजन बाई जी की पंडवानी यात्रा

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव से शुरू होकर वैश्विक मंचों तक पहुँचने की एक अद्भुत और संघर्षपूर्ण कहानी है। उन्होंने रूढ़ियों को तोड़कर इस लोक कला को एक नया आयाम दिया।
उनकी इस गौरवशाली यात्रा के मुख्य पड़ाव इस प्रकार हैं:
1. कला की शुरुआत और कड़ा संघर्ष
बचपन का रुझान: तीजन बाई का जन्म भिलाई के पास गनियारी गांव में हुआ था। उन्हें बचपन से ही अपने नानाजी (बृजलाल पारधी) को महाभारत की कहानियां गाते हुए सुनने का शौक था, जिसने उनके भीतर पंडवानी के प्रति प्रेम जगाया।
समाज का विरोध: उस दौर में पंडवानी विधा पर केवल पुरुषों का वर्चस्व था। जब तीजन बाई ने इसे गाना और सीखना शुरू किया, तो समाज और उनके परिवार ने इसका कड़ा विरोध किया। यहाँ तक कि उन्हें समाज से बहिष्कृत भी होना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
2. ‘कापालिक शैली’ में पहली महिला कलाकार
पंडवानी की दो शैलियाँ होती हैं: ‘वेदमती’ (बैठकर गाना) और ‘कापालिक’ (खड़े होकर, अभिनय के साथ गाना)।
तीजन बाई ने कापालिक शैली को चुना और वे इस शैली में पंडवानी प्रस्तुत करने वाली पहली महिला बनीं।
हाथ में तंबूरा लेकर, उसे कभी गदा, कभी धनुष तो कभी अर्जुन का रथ बनाकर जब वे ओजस्वी स्वर में गाती थीं, तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
3. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दस्तक
पहला बड़ा मंच: 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन किया। इसके बाद मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक मंचों पर उनकी पहचान बनने लगी।
वैश्विक पहचान: प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें नई दिल्ली में प्रदर्शन का मौका दिया। इसके बाद तीजन बाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, तुर्की और ट्यूनिशिया जैसे कई देशों में पंडवानी की गूंज पहुँचाई।





