सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: शादीशुदा बेटी भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार, बिहार सरकार की नीति रद्द
शायरा खातून की याचिका पर फैसला: यह महत्वपूर्ण फैसला शायरा खातून की याचिका पर आया है, जिन्हें सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नौकरी से वंचित कर दिया गया था।

दिल्ली/पटना
प्रवक्ता.कॉम 1 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि विवाह किसी बेटी के अपने परिवार के साथ संबंधों को समाप्त नहीं करता है। शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार की उस नीति को खारिज कर दिया है जिसमें केवल तलाकशुदा या पति द्वारा परित्यक्ता (छोड़ी गई) बेटियों को ही अनुकंपा नियुक्ति के दायरे में रखा गया था, जबकि अन्य शादीशुदा बेटियों को इससे बाहर कर दिया गया था।
कानून की नजर में रूढ़िवादी धारणाओं के लिए कोई जगह नहीं
न्यायालय ने राज्य सरकार की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि शादीशुदा बेटी से आमतौर पर यह उम्मीद की जाती है कि वह विवाह के बाद अपने मायके से संबंध तोड़कर ससुराल में बस जाती है। पीठ ने दो टूक कहा कि कानून में ऐसी किसी रूढ़िवादी धारणा या पूर्वानुमान के लिए कोई स्थान नहीं है कि शादी के बाद बेटी का अपने मायके से कोई नाता नहीं रहता। अदालत ने दोहराया कि बेटा और बेटी के बीच केवल लिंग या वैवाहिक स्थिति के आधार पर वर्गीकरण करना संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का प्रत्यक्ष उल्लंघन और असंवैधानिक है।
तकनीकी आधार पर नहीं ठुकराया जा सकता दावा
मामले की सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि अपीलकर्ता महिला, हालांकि अपने पति से अलग रह रही थी और उसका तलाक औपचारिक रूप से कानूनी रूप से मान्य नहीं हुआ था, फिर भी वह अपने परिवार (मां और भाई) के साथ ही निवास कर रही थी और पूरी तरह उन पर निर्भर थी। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों के उस रुख की आलोचना की जिसमें बहुत अधिक तकनीकी रवैया (hyper-technical approach) अपनाकर अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल वित्तीय संकट से उबारना है, और ऐसे दावों पर विचार करते समय अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण आड़े नहीं आना चाहिए।
अदालत का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को भी खारिज कर दिया जिसमें राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराया गया था। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार को यह निर्देश दिया है कि वह आठ सप्ताह के भीतर नए सिरे से गुण-दोष (merits) के आधार पर आवेदक के अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर विचार करे।
इस निर्णय के मुख्य तथ्य
शादीशुदा बेटियों को बड़ी राहत:
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादीशुदा बेटियों को भी अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी पाने का पूरा समान अधिकार है।
बिहार सरकार की नीति असंवैधानिक:
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने बिहार सरकार की 10 दिसंबर 2014 की उस नीति को रद्द कर दिया, जिसके तहत केवल तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटियों को ही अनुकंपा नियुक्ति के योग्य माना गया था।
समानता के अधिकार का उल्लंघन:
अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है और बेटा-बेटी के बीच किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।
शायरा खातून की याचिका पर फैसला:
यह महत्वपूर्ण फैसला शायरा खातून की याचिका पर आया है, जिन्हें सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नौकरी से वंचित कर दिया गया था।





