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विशेष रिपोर्ट: 16 जून से नया शिक्षा सत्र, पर ‘अध्यक्ष विहीन’ छत्तीसगढ़ राज्य शिक्षा आयोग; क्या कागजों में ही सुधरेगी शिक्षा की गुणवत्ता?

रायपुर प्रवक्ता.कॉम 14 जून 2026

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​रायपुर। छत्तीसगढ़ में आगामी 16 जून से नए शिक्षा सत्र की शुरुआत होने जा रही है। स्कूल सज रहे हैं, बच्चे नई कक्षाओं में प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन प्रदेश में शिक्षा की दिशा और दशा तय करने वाला ‘राज्य शिक्षा आयोग’ खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। विडंबना देखिए कि ढाई साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी वर्तमान भाजपा सरकार इस महत्वपूर्ण आयोग में एक ‘अध्यक्ष’ की नियुक्ति नहीं कर पाई है। आयोग तो अस्तित्व में है, लेकिन वह पूरी तरह से ‘अध्यक्ष विहीन’ है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए शिक्षा और उसके नीति-निर्माण के प्रति गंभीरता सिर्फ दावों तक ही सीमित है?
​पेंशन बाड़ा के एक कमरे में सिमटा आयोग का अस्तित्व, कुर्सियां तोड़ रहे बाबू
​राजधानी रायपुर के पेंशन बाड़ा स्थित माध्यमिक शिक्षा मंडल (माशिमं) परिसर के एक छोटे से कमरे में इस राज्य स्तरीय आयोग का कार्यालय संचालित हो रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि बिना मुखिया (अध्यक्ष) के इस दफ्तर में बैठे सचिव, दो बाबू और चपरासी केवल कुर्सियां तोड़ रहे हैं। जब नीतिगत फैसले लेने वाला ही कोई नहीं है, तो स्टाफ के पास भी केवल रोज दफ्तर आकर हाजिरी लगाने के अलावा कोई काम नहीं बचा है। करोड़ों के बजट और बड़े उद्देश्यों के साथ बना यह आयोग आज महज एक ‘सफेद हाथी’ बनकर रह गया है
​डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में हुआ था गठन, तब थी गंभीरता

​छत्तीसगढ़ में शिक्षा की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम निर्माण, शिक्षक प्रशिक्षण और परीक्षा परिणामों में सुधार के लिए व्यापक नीति बनाने के उद्देश्य से पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने 20 सितंबर 2013 को ‘राज्य शिक्षा आयोग’ का गठन किया था।
​तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में इसके महत्व को समझा गया और चन्द्रभूषण शर्मा को इसका पहला अध्यक्ष बनाया गया, उनके साथ आर.सी. पांडव को सदस्य नियुक्त किया गया था।
​2013 के विधानसभा चुनाव के बाद जब दोबारा भाजपा सरकार बनी, तो 15 जून 2015 को फिर से चन्द्रभूषण शर्मा को ही अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी ताकि नीतियां प्रभावित न हों।
​लेकिन इसके बाद आई कांग्रेस सरकार के 5 साल और अब वर्तमान भाजपा सरकार के ढाई साल बीत जाने के बाद भी यह पद लगातार खाली पड़ा है।
​संघटन मंत्री से लेकर RSS तक गुहार, पर सरकार को नहीं मिल रहा कोई ‘बौद्धिक चेहरा’
​आयोग में अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए शिक्षकों के कई संगठनों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। शिक्षक संघों के प्रतिनिधियों ने भाजपा के संगठन महामंत्री पवन साय से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रांत प्रचारक और पदाधिकारियों तक गुहार लगाई है।
​शिक्षकों का साफ कहना है कि:
​”शिक्षा की गुणवत्ता, नए दौर के हिसाब से पाठ्यक्रम निर्माण और शिक्षकों के सही प्रशिक्षण के लिए आयोग में पूर्णकालिक अध्यक्ष का होना उतना ही जरूरी है, जितना सरकार चलाने के लिए मुख्यमंत्री और विभागों के लिए मंत्रियों का होना।”
​छत्तीसगढ़ में इस समय स्कूल और उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत लाखों छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। उनके भविष्य को संवारने और बेहतर योजना निर्माण के लिए एक योग्य शिक्षाविद की जरूरत है। पर हैरानी की बात है कि पूरी राज्य सरकार अब तक इस पद के लिए एक योग्य शिक्षाविद या बौद्धिक व्यक्ति नहीं ढूंढ पाई है।
​फाइलें चल रही हैं, पर नियुक्ति आदेश कब आएगा?
​पूर्व की कांग्रेस सरकार में जब तत्कालीन शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम से इस पर सवाल हुआ था, तो उन्होंने इसे मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार बताकर पल्ला झाड़ लिया था। अब वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल को भी ढाई वर्ष का समय हो चुका है। मौजूदा शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने महीनों पहले मीडिया और समाचार पत्रों में बयान दिया था कि “अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए फाइल आगे बढ़ी है।” लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी वह फाइल मंत्रालय के चक्कर ही काट रही है, धरातल पर आदेश नहीं उतरा।
महत्वपूर्ण कामों पर लगा है ‘फुल स्टॉप’
​नियमों के मुताबिक, जब तक अध्यक्ष नहीं होता, तब तक विभागीय मंत्री पदेन अध्यक्ष होते हैं, लेकिन मंत्रियों की व्यस्तता के कारण आयोग के मूल काम ठप पड़े हैं। अध्यक्ष न होने से निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य पूरी तरह प्रभावित हैं:
​शिक्षकों की वेतन विसंगति:

पदोन्नति, स्थानांतरण और वेतन विसंगति जैसी जटिल समस्याओं पर सरकार को व्यावहारिक सिफारिशें भेजना।
​शैक्षणिक नवाचार: डिजिटल शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत राज्य में नए तकनीकी प्रयोगों को बढ़ावा देना।
​फीस नियंत्रण: निजी स्कूलों की मनमानी फीस संरचना और विवादों पर सुधार के लिए ठोस सुझाव देना।
​खबर का सार : 16 जून से स्कूलों में घंटियां बजने लगेंगी, ‘शाला प्रवेशोत्सव’ के बड़े-बड़े होर्डिंग्स भी लग जाएंगे। लेकिन जब तक प्रदेश का सबसे बड़ा शिक्षा आयोग नेतृत्व विहीन रहेगा, तब तक छत्तीसगढ़ में शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने का सपना अधूरा ही रहेगा। देखना होगा कि शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव की ‘चली हुई फाइल’ कब अपनी मंजिल पर पहुंचती है और कब इस आयोग को उसका नया मुखिया मिलता है।

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