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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: घूसकांड में शिक्षा विभाग के विकासखंड शिक्षा अधिकारी और क्लर्क बरी, कोर्ट ने कहा- सिर्फ पैसे की बरामदगी जुर्म साबित करने के लिए काफी नहीं

रिश्वत मामले में 9 साल बाद न्याय: बेमेतरा विशेष कोर्ट का फैसला पलटा, हाई कोर्ट ने दो कर्मचारियों को किया दोषमुक्त

बिलासपुर प्रवक्ता.कॉम 1 जुलाई 2026

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​हाई कोर्ट की जस्टिस रजनी दुबे की कोर्ट ने आज ही एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए शिक्षा विभाग के विकासखंड शिक्षा अधिकारी और एक क्लर्क (जिन्हें एक शिक्षककर्मी की रुकी हुई सैलरी जारी करने के एवज में ₹5000 की कथित रिश्वत लेते ट्रैप किया गया था) को बरी कर दिया है।

कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने साफ किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत सिर्फ पैसे की बरामदगी काफी नहीं है। जब तक बिना किसी संदेह के घूस की “मांग” साबित न हो, तब तक सजा नहीं दी जा सकती। इस मामले में वॉयस रिकॉर्डिंग के साथ छेड़छाड़ की आशंका और डिजिटल साक्ष्यों के लिए जरूरी धारा 65B का सर्टिफिकेट न होना कर्मचारियों के पक्ष में गया।

मामले की पृष्ठभूमि

केस का नाम: इस केस में शिकायत कर्ता श्याम कुमार थे ।

अनिल मारकंडे एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (Anil Markende & Anr. v. State of Chhattisgarh – CRA No. 1423 of 2017).

आरोपी कर्मचारी: अनिल मारकंडे (तत्कालीन ब्लॉक शिक्षा अधिकारी , रमेश कुमार चौहान (क्लर्क)

  • क्या था मामला? शिकायतकर्ता की पत्नी शिक्षा कर्मी (वर्ग-3) के पद पर पदस्थ थीं, जिनकी 6 महीने की रुकी हुई सैलरी जारी करने के एवज में कथित तौर पर ₹5,000 की रिश्वत मांगी गई थी. एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने अक्टूबर 2010 में जाल बिछाकर (Trap) अधिकारी की जेब से ₹5,000 के नोट बरामद किए थे.।

निचली अदालत में हुई थी सजा

सितंबर 2017 में बेमेतरा की विशेष अदालत (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) ने दोनों कर्मचारियों को दोषी मानते हुए 3-3 साल के कड़े कारावास की सजा सुनाई थी. इस फैसले के खिलाफ कर्मचारियों ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी.

हाई कोर्ट में बचाव पक्ष (कर्मचारियों) की दलीलें

  1. मांग (Demand) साबित नहीं: कानूनन भ्रष्टाचार के मामले में सिर्फ पैसे की बरामदगी काफी नहीं है, घूस मांगने की प्रामाणिक बात साबित होनी चाहिए, जो इस केस में कहीं साबित नहीं हो रही थी.
  1. सैलरी पहले ही जारी: शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी ने खुद स्वीकार किया कि जाल बिछाने (Trap) की कार्रवाई से पहले ही (5 अक्टूबर 2010 को) उन्हें सैलरी का चेक मिल चुका था, तो फिर रिश्वत किस बात की ली जाती?
  1. वॉयस रिकॉर्डर में छेड़छाड़ की आशंका: जिस वॉयस रिकॉर्डर में घूस की मांग रिकॉर्ड करने का दावा किया गया था, वह रिकॉर्डिंग के बाद कई दिनों तक शिकायतकर्ता के घर पर ही रखा रहा था, जिसे बाद में ACB को सौंपा गया.

हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु और कानूनी टिप्पणी

जस्टिस रजनी दुबे ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए दोनों कर्मचारियों को बाइज्जत बरी कर दिया। कोर्ट ने जांच एजेंसियों के काम करने के तरीके और डिजिटल सबूतों को लेकर बेहद कड़े और महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए:

  • धारा 65B सर्टिफिकेट अनिवार्य: कोर्ट ने कहा कि डिजिटल युग में किसी भी ऑडियो/वॉयस रिकॉर्डिंग को साक्ष्य (Evidence) मानने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B का सर्टिफिकेट होना अनिवार्य है। अभियोजन पक्ष ऐसा कोई सर्टिफिकेट कोर्ट में पेश नहीं कर पाया।
  • वॉयस सैंपल और FSL जांच का अभाव: जांच अधिकारी (IO) ने न तो आरोपियों के आवाज के नमूने (Voice Samples) लिए और ना ही रिकॉर्डिंग को फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) जांच के लिए भेजा। गवाहों ने भी माना कि रिकॉर्डिंग स्पष्ट नहीं थी और उसमें कई लोगों की आवाजें मिक्स थीं।
  • सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला: हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों (जैसे B. Jayaraj बनाम आंध्र प्रदेश राज्य) का हवाला देते हुए दोहराया कि “रिश्वत की मांग करना अपराध की मुख्य जड़ (Sine Qua Non) है।” केवल किसी की जेब या टेबल से रंग लगे नोट (Tainted Money) बरामद हो जाने से किसी को तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक यह साबित न हो कि उसने स्वेच्छा से घूस मांगी थी.

संदेह का लाभ: कोर्ट ने माना कि पूरी कार्रवाई और शिकायतकर्ता का आचरण संदिग्ध था. साक्ष्यों की कड़ियों में भारी कमियां होने के कारण कर्मचारियों को “संदेह का लाभ” (Benefit of Doubt) देते हुए दोषमुक्त किया गया.

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