हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी विभाग की जिद; शिक्षकों का सवाल— “अगर ऑनलाइन हाजिरी चाहिए, तो सरकारी डिवाइस क्यों नहीं देती सरकार?” वेतन रोकने की धमकी देना असंवैधानिक
वेतन रोकने की धमकी असंवैधानिक: शिक्षकों का कहना है कि एक तरफ हाईकोर्ट ने ऐप लागू करने का दबाव बनाने और अनुशासनात्मक कार्रवाई करने पर रोक लगाई थी, वहीं दूसरी तरफ विभाग 'वेतन रोकने' जैसा दंडात्मक आदेश जारी कर कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रहा है।
रायपुर प्रवक्ता.कॉम 13 जून 2026
रायपुर | 13 जून 2026
छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग और शिक्षकों के बीच विद्या समीक्षा केंद्र (VSK) ऐप से ऑनलाइन हाजिरी को लेकर टकराव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। फरवरी 2026 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा VSK ऐप की अनिवार्यता और शिक्षकों पर दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने के बावजूद, लोक शिक्षण संचालनालय ने 12 जून 2026 को एक नया फरमान जारी कर दिया है।
इस नए आदेश के तहत 16 जून 2026 से सभी शाला कर्मचारियों को VSK ऐप से उपस्थिति दर्ज करना अनिवार्य किया गया है, ऐसा न करने पर ‘शून्य उपस्थिति’ मानकर जून महीने का वेतन रोकने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग के इस कड़े रुख के बाद शिक्षक संगठनों और कानूनी जानकारों के बीच एक बड़ा बुनियादी सवाल उठ खड़ा हुआ है— “जब व्यवस्था सरकार की है, तो संसाधन शिक्षक अपने जेब से क्यों लगाएं?”
शिक्षकों की जायज मांग: निजी फोन सरकारी काम के लिए क्यों?
प्रदेश के शिक्षकों का साफ कहना है कि वे डिजिटल प्रशासन या ऑनलाइन हाजिरी के विरोधी नहीं हैं, लेकिन इसे लागू करने का तरीका पूरी तरह दोषपूर्ण है। शिक्षकों के मुख्य तर्क इस प्रकार हैं:
सरकारी डिवाइस या टैबलेट दे सरकार:
यदि शिक्षा विभाग को शत-प्रतिशत ऑनलाइन मॉनिटरिंग और बायोमेट्रिक/ऐप आधारित हाजिरी चाहिए, तो उसे हर स्कूल या शिक्षक को आधिकारिक टैबलेट, स्मार्टफोन और इंटरनेट डेटा की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए।
डेटा सुरक्षा और निजता का खतरा: कोर्ट में भी यह दलील दी गई थी कि किसी थर्ड-पार्टी ऐप को निजी फोन में डाउनलोड कराना निजता का उल्लंघन है। कई शिक्षकों ने शिकायत की है कि ऐप डाउनलोड करने के बाद असामाजिक तत्वों द्वारा धोखाधड़ी के प्रयास भी हुए हैं।
वेतन रोकने की धमकी असंवैधानिक: शिक्षकों का कहना है कि एक तरफ हाईकोर्ट ने ऐप लागू करने का दबाव बनाने और अनुशासनात्मक कार्रवाई करने पर रोक लगाई थी, वहीं दूसरी तरफ विभाग ‘वेतन रोकने’ जैसा दंडात्मक आदेश जारी कर कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रहा है।
क्या कहता है कानूनी पक्ष?
संवैधानिक और कानूनी जानकारों के मुताबिक, दुनिया के किसी भी आधुनिक या डिजिटल प्रशासनिक ढांचे में कर्मचारियों को अपने व्यक्तिगत संसाधनों (Personal Resources) को आधिकारिक ड्यूटी के लिए इस्तेमाल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि सरकार बिना शासकीय डिवाइस और इंटरनेट भत्ता दिए निजी फोन पर ऐप चलाने का दबाव बनाती है, तो यह श्रम अधिकारों और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
टकराव के आसार, 16 जून पर टिकी निगाहें
विभाग के इस आदेश (image_3.png) के बाद शिक्षकों में भारी आक्रोश है। शिक्षक संघों का कहना है कि सरकार को जिद छोड़कर पहले इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी डिवाइस की व्यवस्था करनी चाहिए। अब देखना यह होगा कि 16 जून को शिक्षक इस आदेश के आगे झुकते हैं या फिर कोर्ट के अवमानना (Contempt of Court) के मामले के साथ सरकार के खिलाफ लामबंद होते हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने अटेंडेंस लगाने पर लगाई है रोक



इस मामले की सुनवाई जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकल पीठ में हुई। याचिकाकर्ता शिक्षक कमलेश सिंह बिसेन ने खुद अदालत में पेश होकर अपना पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि यह मुद्दा न केवल उनकी व्यक्तिगत निजता का है, बल्कि सभी सरकारी कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, जिन्हें अपने निजी संसाधनों का उपयोग करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
प्रस्तुत तर्कों को सुनने और संबंधित कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश पर सवाल उठाए।
अदालत का अंतरिम आदेश:
कार्रवाई पर रोक: अदालत ने अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता शिक्षक के खिलाफ VSK ऐप इंस्टॉल न करने या उसका उपयोग न करने के संबंध में किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक या दंडात्मक विभागीय कार्रवाई पर रोक लगा दी है।
बाध्यता नहीं: याचिकाकर्ता को अब VSK ऐप इंस्टॉल करने या उपयोग करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
सरकार को नोटिस: हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार (स्कूल शिक्षा विभाग) को नोटिस जारी किया है और दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।






