क्या ACB की ‘काली सूची’ सिर्फ एक छलावा है? ट्रैप के आंकड़ों के पीछे छिपा छत्तीसगढ़ का असली ‘महास्कैम’, स्वास्थ्य विभाग को क्लीन चिट या आँखों में धूल झोंकना?
रायपुर/प्रवक्ता डॉट कॉम/29 अक्टूबर 2026
छत्तीसगढ़ एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) की ताजा रिपोर्ट ने बाज़ार में सनसनी तो मचा दी है कि राजस्व और शिक्षा विभाग घूसखोरी में नंबर-1 और नंबर-2 हैं। लेकिन क्या सिर्फ नोटों के बंडल के साथ रंगे हाथों पकड़े जाने (Trap) की संख्या ही किसी विभाग की असली छवि तय कर सकती है? क्या जिन विभागों का नाम इस लिस्ट में नीचे है या गायब है, वे दूध के धुले हैं?
ज़रा ठहरिए! अगर आप ऐसा सोच रहे हैं, तो आप सिस्टम के सबसे बड़े झांसे में आ चुके हैं। आइए करते हैं इस रिपोर्ट का वह पोस्टमार्टम, जिसे सरकारी फाइलें हमेशा छुपाना चाहती हैं।

बड़ा सवाल : स्वास्थ्य विभाग इस लिस्ट से गायब क्यों? क्या मिल गई क्लीन चिट?
इस सूची को देखकर कोई भी हैरान हो जाएगा कि जनता की ज़िंदगी से सीधे जुड़े स्वास्थ्य विभाग (Health Department) का नाम इसमें न के बराबर है। तो क्या छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य महकमा पूरी तरह ईमानदार हो चुका है? जवाब है—कतई नहीं!स्वास्थ्य विभाग को इस आंकड़े के आधार पर ‘क्लीन चिट’ देना जनता की आँखों में धूल झोंकने जैसा है। सच तो यह है कि पिछले 5 सालों में प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में दवाओं की खरीदी, अस्पतालों के निर्माण और वेंटिलेटर-इक्विपमेंट सप्लाई में सैकड़ों करोड़ रुपये के बड़े टेंडर घोटाले और घोटाले की शिकायतें सामने आई हैं।
ट्रैप बनाम टेंडर : पैमाना कैसे तय होगा साहब? भ्रष्टाचार के पैमाने को समझने के लिए आपको दो तरह के करप्शन का फर्क समझना होगा:
1. खुदरा भ्रष्टाचार (Retail Corruption – ट्रैप मामले): यह राजस्व, शिक्षा या पुलिस जैसे विभागों में होता है। यहाँ एक आम आदमी अपना नामांतरण कराने या शिक्षक अपना ट्रांसफर रुकवाने के लिए बाबू या पटवारी को 5 हजार ,10 हजार जैसे कुछ रकम सीधे हाथ में देता है। इसे ACB आसानी से जाल बिछाकर (Trap) रंगे हाथों पकड़ लेती है। इसलिए यहाँ आंकड़ों का अंबार दिखता है।
2. थोक भ्रष्टाचार (Wholesale Corruption – सिंडिकेट घोटाला): स्वास्थ्य विभाग , आबकारी या कोयला जैसे विभागों में कोई आम आदमी पटवारी की तरह लाइन नहीं लगाता। यहाँ खेल बंद कमरों में, टेंडरों की फिक्सिंग, बोगस सप्लायर्स और ऊंचे राजनीतिक-प्रशासनिक रसूखदारों के बीच होता है। यहाँ रिश्वत ‘कैश’ में हाथ बदलने के बजाय फर्जी कंपनियों और कमिशन खोरी के जरिए सीधे ऊपर पहुंच जाती है।यही वजह है कि स्वास्थ्य विभाग में टेबल के नीचे से 2 हजार रुपये की घूस भले न पकड़ी गई हो, लेकिन टेंडरों के जरिए करोड़ों-अरबों का वारा-न्यारा करने वाले बड़े खिलाड़ी ACB के इस ‘ट्रैप जाल’ में नहीं फंसते।
इन मामलों का क्या ? दवा और रिजेंट खरीदी में 500 करोड़ से अधिक का खेल करने वाले मोक्षित कार्पोरेशन , बीजापुर में एमसीएच अस्पताल में निविदा निरस्त होने के बाद उसका कार्यादेश जारी कर भुगतान करना , ब्लैकलिस्टेड कंपनी हरी स्टोर मंडी रोड धमतरी को करोड़ों का टेंडर देना जैसे भ्रष्टाचार -घोटालों की लंबी फेहरिस्त है जो विभाग को दिखाई नहीं देता या मामला कुछ और है ?
तो फिर असली पैमाना क्या है? : अगर भ्रष्टाचार का पैमाना सिर्फ ‘ट्रैप’ को माना जाएगा, तो यह छोटे चूहों को पकड़कर मगरमच्छों को छोड़ देने जैसा होगा। स्वास्थ्य विभाग में बीते वर्षों में हुए बड़े मामलों (जैसे कोविड काल के दौरान की गई खरीदारियों में गड़बड़ी के आरोप, फर्जी मेडिकल सप्लाई) की जांच EOW और ED जैसी एजेंसियां अलग से करती रही हैं, न कि रोज़मर्रा के ट्रैप केस में।
एक नजर रिपोर्ट में डालिये : •
राजस्व विभाग (नंबर-1): ज़मीन का नामांतरण हो, सीमांकन हो या फौती चढ़वाना हो, बिना ‘सेवा-शुल्क’ के फाइल हिलना नामुमकिन हो चुका है। यही वजह है कि पिछले 5 साल में सबसे ज़्यादा 56 ट्रैप मामले अकेले इसी विभाग में हुए, जहाँ 67 अधिकारियों-कर्मचारियों को रंगे हाथों घूस लेते दबोचा गया।
• स्कूल शिक्षा विभाग (नंबर-2): जो विभाग बच्चों का भविष्य संवारने के लिए है, वह भ्रष्टाचार के मामले में दूसरे पायदान पर काबिज़ है। शिक्षकों के ट्रांसफर, अटैचमेंट और एरियर भुगतान जैसी फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए जमकर उगाही हो रही है। शिक्षा विभाग में 20 ट्रैप मामलों में 25 गुरुजी और बाबू सलाखों के पीछे पहुँच चुके हैं।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग (नंबर-3): गांवों के विकास के नाम पर आने वाले फंड और योजनाओं को पास करने के लिए यहाँ जमकर रिश्वतखोरी हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, इस विभाग में 14 ट्रैप मामले दर्ज किए गए, जिनमें 15 अधिकारियों-कर्मचारियों (जैसे जनपद सीईओ और अनुविभागीय अधिकारी) को रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया।
गृह (पुलिस) विभाग (नंबर-4): न्याय और सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी जिस पुलिस महकमे पर है, वह खुद इस सूची में चौथे स्थान पर है। यहाँ कुल 10 ट्रैप प्रकरण सामने आए, जिनमें 13 पुलिसकर्मियों (मुख्य रूप से एएसआई और हेड कांस्टेबल) को घूस लेते हुए दबोचा गया।
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग: शहरों के विकास, निर्माण कार्यों और नगर निगम की फाइलों को पास कराने के नाम पर इस विभाग में भी जमकर मलाई काटी गई। पिछले 5 साल में यहाँ 7 ट्रैप मामले दर्ज हुए, जिसमें 10 लोकसेवकों (2 सहायक अभियंताओं सहित) पर गाज गिरी।
परिवहन विभाग (सबसे नीचे): इस पूरी अवधि में सबसे राहत देने वाला आंकड़ा परिवहन विभाग का रहा, जहां केवल 1 ट्रैप मामला ही दर्ज हो पाया।
राजस्व और शिक्षा जैसे कुछ विभाग में ‘खुलेआम’ लूट मची है, इसलिए वे बदनाम हैं। लेकिन स्वास्थ्य जैसे विभाग ‘सलीके और सिंडिकेट’ से चलते हैं, इसलिए वे ACB की इस कागज़ी दौड़ में साफ बच निकलते हैं। जनता को यह समझना होगा कि जो विभाग जितना शांत दिख रहा है, मुमकिन है कि वहाँ अंदरूनी खेल उतना ही गहरा और बड़ा चल रहा हो!






