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छत्तीसगढ़ में मेडिकल का नया कीर्तिमान: अम्बेडकर अस्पताल रायपुर ने 15 साल के बच्चे समेत 20 दिन में की फेफड़ों की 9 लोबेक्टॉमी सर्जरी

आंबेडकर अस्पताल रायपुर ने फेफड़ों की जटिल सर्जरी में रचा इतिहास: मात्र दो महीनों में 13 सफल लोबेक्टॉमी कर मरीजों को दिया नया जीवन

रायपुर प्रवक्ता कॉम 10 अगस्त 2026

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पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सालय से संबद्ध डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय, रायपुर के हार्ट-चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग ने फेफड़ों की जटिल सर्जरी के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर हासिल किया है। विभाग ने मात्र 20 दिनों में 9 और पिछले दो महीनों में कुल 13 सफल लोबेक्टॉमी (फेफड़े के संक्रमित हिस्से को निकालने की सर्जरी) कर मरीजों को नया जीवनदान दिया है।

​इस उपलब्धि में दो आपातकालीन सर्जरी उन मरीजों की थीं, जिन्हें खांसी के साथ गंभीर रूप से रक्तस्राव (हेमोप्टाइसिस) हो रहा था। आधुनिक तकनीक और एडवांस्ड लंग स्टेपलर की मदद से की गई इन जटिल ऑपरेशनों ने न केवल संस्थान की दक्षता को साबित किया है, बल्कि छत्तीसगढ़ को फेफड़े की सर्जरी के मामले में अग्रणी राज्यों की श्रेणी में ला खड़ा किया है।

​छत्तीसगढ़ के लिए एक बड़ा कीर्तिमान

​हार्ट-चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू ने बताया कि छत्तीसगढ़ के किसी भी निजी या सरकारी संस्थान की तुलना में इतने कम समय में इतनी अधिक लोबेक्टॉमी सर्जरी किया जाना अस्पताल के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि और पूरे प्रदेश के लिए गौरव का विषय है।

​उन्होंने बताया कि सामान्यतः इस संस्थान में साल भर में 15 से 20 लोबेक्टॉमी सर्जरी होती हैं। यहाँ केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से भी मरीज इलाज के लिए पहुँचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये सभी जटिल ऑपरेशन आयुष्मान योजना के तहत पूरी तरह निःशुल्क किए जा रहे हैं।

​ क्या होती है लोबेक्टॉमी सर्जरी?

​मानव शरीर में दो फेफड़े होते हैं:

बायां फेफड़ा:

दो लोब (अपर लोब और लोअर लोब) से मिलकर बनता है।

दायां फेफड़ा:

तीन लोब (अपर लोब, मिडिल लोब और लोअर लोब) में बंटा होता है।

​जब फेफड़े का कोई हिस्सा (जैसे एस्परजिलोमा, ब्रोन्किएक्टैसिस या ट्यूमर) किसी एक विशेष लोब तक सीमित होता है, तो सर्जरी के माध्यम से केवल उस संक्रमित हिस्से को बाहर निकाल दिया जाता है, जिसे लोबेक्टॉमी कहा जाता है।

​इस प्रक्रिया में छाती में चीरा लगाकर आधुनिक लंग स्टेपलर का उपयोग किया जाता है। इससे भविष्य में होने वाली जटिलताओं, जैसे ‘ब्रोन्कोप्लूरल फिस्टुला’ (Bronchopleural Fistula) की संभावना बेहद कम हो जाती है। मरीज सामान्यतः 6 से 8 दिनों के भीतर स्वस्थ होकर डिस्चार्ज हो जाते हैं।

​फेफड़ों में संक्रमण और खून आने के प्रमुख कारण

​डॉ. साहू के अनुसार, छत्तीसगढ़ में लोबेक्टॉमी की आवश्यकता पड़ने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  1. एस्परजिलोमा : यह एस्परजिलस नाइजर (Aspergillus niger) नामक फंगस से होता है। यह संक्रमण आमतौर पर टीबी के पुराने मरीजों या कम इम्युनिटी वाले लोगों को होता है, जो अक्सर दाहिने फेफड़े के ऊपरी भाग में पनपता है।
  2. ब्रोन्किएक्टैसिस : फेफड़े के टीबी संक्रमण के बाद की यह एक आम स्थिति है, जिसमें फेफड़े के अंदर छोटी-छोटी कैविटी (गुहा) बन जाती हैं और संक्रमण के कारण खांसी में खून आने लगता है।
  3. वैस्कुलर मालफॉर्मेशन और लंग एब्सिस: फेफड़े में बड़ी कैविटी बनने से हेमोप्टाइसिस (खांसी में खून) की समस्या होती है।
  4. फेफड़े का कैंसर: शुरुआती अवस्था में फेफड़े के कैंसर के इलाज के लिए लोबेक्टॉमी एक बेहद असरदार और जीवनरक्षक प्रक्रिया है।

​विभाग में उपलब्ध अन्य उन्नत सर्जरी सुविधाएँ

​डॉ. कृष्णकांत साहू के नेतृत्व में संचालित इस विभाग में फेफड़े से जुड़ी कई अन्य उच्चस्तरीय सर्जरी भी सफलतापूर्वक की जाती हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

डिकॉर्टिकेशन सर्जरी

सेगमेंटेक्टॉमी (Segmentectomy)

न्यूमोनेक्टॉमी (Pneumonectomy): जिसमें सुरक्षा की दृष्टि से एक तरफ के पूरे (दाएं या बाएं) फेफड़े को निकाल दिया जाता है।

​अम्बेडकर अस्पताल की इस मेडिकल टीम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उच्च तकनीकी विशेषज्ञता और सरकारी योजनाओं के सटीक तालमेल से आम जनता को विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएँ उनके अपने राज्य में ही मिल सकती हैं।

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