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टीईटी अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों का फूटा गुस्सा: “समय रहते केंद्र सरकार संशोधन करे, वरना भुगतना पड़ेगा खामियाजा” छत्तीसगढ़ में नाराज शिक्षकों ने कहा अगर सच में सरकार शिक्षकों के साथ तो विधानसभा में प्रस्ताव करे पारित

दिल्ली/भोपाल/रायपुर

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प्रवक्ता.कॉम 30 अगस्त 2026

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में आज देश के कोने-कोने से आए शिक्षकों ने अपनी विभिन्न मांगों और समस्याओं को लेकर एक विशाल विरोध प्रदर्शन किया। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के शिक्षक इस प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे, जिससे दिल्ली के प्रदर्शन स्थल पर भारी भीड़ देखने को मिली। शिक्षकों ने केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों की नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अपनी नाराजगी जाहिर की।

“टीईटी की समस्या केंद्र सरकार की देन”

प्रदर्शन में मौजूद शिक्षक नेताओं और प्रतिनिधियों ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से उत्पन्न विवाद और संकट के लिए सीधे तौर पर केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि टीईटी से जुड़े नियमों और भ्रम की स्थिति को पैदा करने में केंद्र की नीतियों की मुख्य भूमिका रही है।

“सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आड़ न ले”

शिक्षकों ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल तत्कालीन नियमों और व्यवस्था के तहत आदेश और दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए कहा है, लेकिन असली नीतिगत समस्या केंद्र सरकार की बनाई हुई है। शिक्षक नेताओं ने कहा, “सरकारें अपनी असफलताओं और गलत फैसलों को छिपाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कंधे पर बंदूक रखकर न चलाएं और आदेशों की आड़ लेना बंद करें।”

देश भर से जुटे शिक्षक, एकजुटता का दिया संदेश

विरोध प्रदर्शन में जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों सहित मध्य भारत और दक्षिण भारत से आए हजारों शिक्षकों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें

​शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता को लेकर उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों के शिक्षकों और उनके परिजनों में केंद्र सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। शिक्षकों का स्पष्ट कहना है कि यदि केंद्र सरकार ने समय रहते टीईटी के नियमों में आवश्यक संशोधन नहीं किया, तो सरकार को शिक्षकों और उनके परिवारों की बढ़ती नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

​शिक्षकों ने कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार से कहा कि “मानसिक उत्पीड़न और नौटंकी बंद की जाए।” उनका कहना है कि वर्षों से निष्ठापूर्वक सेवाएं दे रहे शिक्षकों पर इस उम्र में परीक्षा थोपकर उनके भविष्य और मान-सम्मान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ में भी तमिलनाडु की तर्ज पर विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने की मांग

​शिक्षकों का कहना है कि जिस तरह तमिलनाडु सरकार ने अपनी विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर शिक्षकों के हित में स्टैंड लिया है, ठीक उसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ सरकार को भी विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजना चाहिए। इससे पूर्व-नियुक्त और वरिष्ठ शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से राहत मिल सकेगी।

“शिक्षक राष्ट्र निर्माता हैं, उन्हें मानसिक प्रताड़ना नहीं, सम्मान चाहिए”

​कबीरधाम जिले के विकास खंड बोड़ला (संकुल सारंगपुर कला) स्थित शासकीय प्राथमिक शाला मानिकपुर के सहायक शिक्षक सुरेश कुमार वर्मा एवं अन्य शिक्षक प्रतिनिधियों ने टीईटी अनिवार्यता के दुष्प्रभावों को रेखांकित किया है:

मानसिक तनाव व अवसाद: लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों में टीईटी के भय से गंभीर मानसिक तनाव और पारिवारिक चिंताएं बढ़ रही हैं।

अनुभव का अपमान: नियुक्ति के समय तय की गई योग्यता और चयन प्रक्रिया को दरकिनार कर पदोन्नति व सेवा सुरक्षा पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

अव्यवहारिकता के खि लाफ संघर्ष: शिक्षकों का कहना है कि वे न्यायपालिका और व्यवस्था के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि नियमों की अव्यवहारिकता के खिलाफ हैं।

शिक्षकों की प्रमुख मांगें:

2010 से पूर्व नियुक्त एवं कार्यरत शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से पूर्ण राहत दी जाए।

अनुभव एवं वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति का लाभ दिया जाए।

नियुक्ति के समय की पात्रता और चयन प्रक्रिया का सम्मान किया जाए।

छत्तीसगढ़ विधानसभा में तमिलनाडु की तरह शिक्षकों के पक्ष में संकल्प/प्रस्ताव पारित किया जाए।

​शिक्षकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर जल्द ही न्यायपूर्ण समाधान नहीं निकाला गया, तो यह आक्रोश बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।

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