छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले पर टकराव: पेंशन विवाद में सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची, तो शिक्षकों ने कहा- ‘निर्णय की गलत व्याख्या हो रही, जीत हमारी होगी’ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर में दायर याचिका (परमेश्वर प्रसाद जैसवाल एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ शासन) में सरकार हार के बाद सुप्रीम कोर्ट गई है लेकिन वहां भी शिक्षकों ने केविएट लगाया है, न्यायपालिका ने विभिन्न फैसलों में दोहराया है कि पेंशन और ग्रेच्युटी कोई खैरात या दान नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा की गई लंबी, निष्पक्ष और निरंतर सेवा का अर्जित अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत संपत्ति का अधिकार भी है। संवर्ग बदलने से सेवा पुरानी से अमान्य नहीं

रायपुर प्रवक्ता कॉम 2 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ के शिक्षक (एलबी) संवर्ग के लगभग 1.60 लाख कर्मचारियों के पेंशन निर्धारण और सेवा गणना को लेकर विवाद गहरा गया है। राज्य शासन द्वारा शिक्षकों के दावों को खारिज किए जाने के बाद अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। वहीं, शिक्षकों ने शासन के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि निर्णय की गलत व्याख्या की जा रही है और अंततः जीत उनकी होगी।
सरकार ने के अनुसार 1998 नहीं 2018 से होगी सेवा गणना
1 जुलाई 2018 से मानी जाएगी सेवा अवधि:
स्कूल शिक्षा विभाग ने आधिकारिक आदेश जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षकों की प्रथम नियुक्ति (शिक्षाकर्मी के रूप में) की तिथि से सेवा गणना का लाभ नहीं मिलेगा। संविलियन की तिथि यानी 1 जुलाई 2018 ही कट-ऑफ डेट रहेगी। शासन के अनुसार, शासकीय सेवा में आने से पूर्व के किसी भी दावे को भूतलक्ष्य प्रभाव से स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के निर्देश पर हुआ था निर्णय:
यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर में दायर याचिका (परमेश्वर प्रसाद जैसवाल एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ शासन) से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को शासन को निर्देश दिया था कि वह इस मामले में सहानुभूतिपूर्वक और संवैधानिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए तर्कसंगत निर्णय ले। इसी के पालन में शासन ने दावों को अमान्य किया है।
सरकार का तर्क:
पंचायत राज अधिनियम: शासन ने हवाला दिया है कि संविलियन से पहले शिक्षक (पंचायत/नगरीय निकाय) संवर्ग के कर्मचारी पंचायत राज अधिनियम 1993 के अधीन थे।
नियंत्रण और अनुच्छेद 309: ये कर्मचारी पूरी तरह जिला या जनपद पंचायत के नियंत्रण में थे और संविलियन से पूर्व भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत शासकीय सेवक की श्रेणी में नहीं आते थे।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है पेंशन कोई दान नहीं –
पेंशन कोई ‘दान’ नहीं:
न्यायपालिका ने विभिन्न फैसलों में दोहराया है कि पेंशन और ग्रेच्युटी कोई खैरात या दान नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा की गई लंबी, निष्पक्ष और निरंतर सेवा का अर्जित अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत संपत्ति का अधिकार भी है।
संवर्ग बदलने पर पुरानी सेवा अमान्य नहीं:
अदालतों का मानना रहा है कि केवल विभाग या संवर्ग बदलने से कर्मचारियों की वर्षों की लंबी और निरंतर सेवा को शून्य या समाप्त नहीं किया जा सकता।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला:
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने (दिनेश कुमार शर्मा बनाम मध्य प्रदेश शासन और पुष्पा तिवारी मामले में) स्पष्ट किया था कि जब शिक्षकों (पंचायत संवर्ग) को शासकीय सेवा में संविलियन कर लिया जाता है और वे सरकारी सेवकों पर लागू होने वाले नियमों के अधीन आ जाते हैं, तो उनकी संविलियन से पहले की सेवा को नजरअंदाज करना या उससे वंचित करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। अदालत ने इन मामलों में पूर्व सेवा को जोड़कर पेंशन और संशोधित वेतनमान का लाभ देने के निर्देश दिए थे।
आगे की स्थिति और कानूनी लड़ाई
सरकार सुप्रीम कोर्ट में:
हाईकोर्ट के निर्देशों और प्रशासनिक दावों के बीच राज्य सरकार इस मामले को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है।
शिक्षकों का रुख:
दूसरी ओर, प्रभावित शिक्षकों का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या करते हुए उनके अधिकारों को सीमित किया जा रहा है। शिक्षकों का दावा है कि वे इस कानूनी लड़ाई को मजबूती से लड़ेंगे और अंततः उनकी ही जीत होगी।
अदालत का रास्ता खुला:
शासन के इस फैसले से उन शिक्षकों को बड़ा झटका लगा है जो रिटायरमेंट के बाद बेहतर पेंशन की उम्मीद लगाए बैठे थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने पिछले आदेश में यह स्पष्ट किया था कि यदि शिक्षक शासन के नीतिगत निर्णय से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो वे पुनः कानूनी उपचार का रास्ता चुन सकते हैं।





