छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग: शिक्षकों के ताबड़तोड़ ट्रांसफर पर उठे सवाल, क्या ‘आपसी सहमति’ के नाम पर चल रही है मनमानी? सुशासन की इससे बेहतर मिसाल कहां मिलेगी आदेश विभाग के पब्लिक डोमेन में कहां विभाग बताए !

रायपुर प्रवक्ता .कॉम 26 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा हाल ही में दिनांक 25 अगस्त 2026 को एक बड़ा आदेश जारी करते हुए राज्य के कई शासकीय सेवकों और शिक्षकों के स्थानांतरण सूची जारी की गई है. इस सूची के सामने आते ही शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। एक तरफ जहां प्रदेश में सामान्य ट्रांसफर पर प्रतिबंध (बैन) होने का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी ओर धड़ल्ले से हो रहे तबादलों ने कई सुलगते सवाल छोड़ दिए हैं।
सवाल क्यों न उठे 😕 जवाब है तो दीजिए
आपसी सहमति की आड़ में ट्रांसफर:
खबर के लिए इस आदेश में से कुछ शिक्षकों और शासकीय सेवकों के नाम नीचे दिए जा रहे हैं, जिन्हें आप अपनी खबर में उदाहरण के तौर पर उपयोग कर सकते हैं:
कविलास (सहायक शिक्षक, कांकेर से एम.सी.बी.) और नीता (सहायक शिक्षक, एम.सी.बी. से कांकेर)
रुखसार आफरीन और टेकराम (सहायक शिक्षक)
श्री खिलेश कुमार एवं श्री राजेश कुमार मोबेकर (सहायक शिक्षक, दुर्ग)
श्री रज्जू कुमार डहरिया एवं श्री राधेश्याम राय (व्याख्याता, रसायन)
कु. महिमा टोप्पो एवं श्रीमती सारिका वर्मा (व्याख्याता एल.बी., अंग्रेजी)
केशव कुमार साहू एवं श्री शेषनारायण वर्मा (सहायक शिक्षक एल.बी., बलौदाबाजार-भाटापारा)
निशा जायसवाल एवं श्री ऋषभ कुमार गुप्ता (सहायक शिक्षक विज्ञान, मुंगेली और सरगुजा)
श्री रूपेश नागपुरे एवं श्री नंद कुमार पटेल (व्याख्याता वाणिज्य, राजनांदगांव)
श्रीमती सोहद्रा साहू एवं श्रीमती हेमकली साहू (सहायक शिक्षक, धमतरी)
श्रीमती पूनम मिंज एवं श्री सूरज कुमार ढीमर (शिक्षक, जीवविज्ञान
सूची में कुल 126 क्रम तक के शिक्षकों/कर्मचारियों के आपसी (Mutual) ट्रांसफर किए गए हैं।
विभाग द्वारा जारी इस आदेश में अधिकांश शिक्षकों के स्थानांतरण का आधार ‘आपसी’ यानी आपसी सहमति बताया गया है। ताबड़तोड़ 126 शिक्षकों के आपसी ट्रांसफर करके विभाग ने बता दिया है विभाग में निरंकुशता किस कदर हावी है। जो करना है कर दिया जिसे लड़ना है हाईकोर्ट जाओ।
बैन के बावजूद प्रक्रिया पर संशय:
जब प्रदेश में प्रशासनिक स्तर पर स्थानांतरون पर रोक की लगी हुई हैं, तब इस तरह बड़े पैमाने पर आदेश निकलना से हजारों ऐसे शिक्षक नाराज और दुखी हैं जो कई सालों से अपने बूढ़े माता पिता से दूर नौकरी कर रहे है।
शिक्षकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
नीति की बदनामी:
जानकारों का मानना है कि इस तरह के मनमाने प्रतीत होने वाले फैसलों से सीएम समन्वय की नीति की छवि धूमिल हो रही है, जिससे शासन की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है।
इससे अच्छी तो पिछली सरकार पिछली नीतियों से तुलना:
शिक्षकों का यह भी कहना है कि पूर्ववर्ती भूपेश बघेल की सरकार के समय शिक्षकों के लिए एक स्पष्ट और खुली ट्रांसफर पॉलिसी लाई गई थी, जिससे सबको पारदर्शी तरीके से लाभ मिल सकता था। वर्तमान व्यवस्था में बिना ‘सेटिंग’ वाले शिक्षक खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
”यदि हर कोई अपनी पसंद और जुगाड़ से ट्रांसफर कराता रहेगा, तो सामान्य और जरूरतमंद शिक्षक कहां जाएंगे? क्या प्रशासनिक व्यवस्था भगवान भरोसे है?” — एक पीड़ित शिक्षक
न्याय के लिए हाईकोर्ट ही एक मात्र रास्ता
विशेषज्ञों और शिक्षाविदों का कहना है कि यदि किसी पात्र शिक्षक के साथ अन्याय हुआ है या नियमों की अनदेखी कर सिर्फ सिफारिशियों को लाभ पहुंचाया जा रहा है, तो प्रभावित शिक्षकों के पास वैधानिक विकल्प खुले हुए हैं। वे न्याय की गुहार लगाने के लिए माननीय हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।





