शिक्षक दिवस विशेष: सम्मान के फूल या हक की लड़ाई? क्या समाज और सरकार ने गुरुओं को दिया उनका अधिकार?

रायपुर प्रवक्ता.कॉम 5 सितंबर 2026
हर साल 5 सितंबर को देशभर में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर ‘शिक्षक दिवस’ बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों को फूलों के गुलदस्ते दिए जाते हैं, मंच से उनके ‘राष्ट्र निर्माता’ होने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन जैसे ही इस एक दिन के जश्न का गुबार छंटता है, वही शिक्षक अपनी बुनियादी मांगों, वेतन विसंगतियों और पदोन्नति के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते नजर आते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है—

क्या समाज और सरकार ने वास्तव में शिक्षकों को वह सब दिया है, जिसके वे हकदार हैं?
कागजों पर ‘राष्ट्र निर्माता’, धरातल पर समस्याओं से घिरे गुरुजन
छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश में शिक्षा और शिक्षकों की स्थिति को देखें तो तस्वीर का दूसरा पहलू काफी चिंताजनक है। शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी जायज मांगों को लेकर संघर्षरत है:
पदोन्नति और पात्रता का पेंच: छत्तीसगढ़ में हजारों सहायक शिक्षक लंबे समय से पदोन्नति (Promotion) का इंतजार कर रहे हैं। टीईटी (TET) की शर्तों और प्रशासनिक लेटलतीफी के कारण मामला अक्सर कोर्ट की चौखट तक पहुंच जाता है।
बकाए भत्ते और एरियर्स: 86 महीनों का लंबित डीए (महंगाई भत्ता) और एरियर्स पाने के लिए शिक्षक संगठनों को बार-बार ज्ञापन और आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
गैर-शैक्षणिक कार्यों की बेगार: पढ़ाने का काम छोड़ शिक्षकों से चुनाव, जनगणना, सर्वेक्षण और विभिन्न शासकीय योजनाओं के आंकड़े एकत्रित करवाए जाते हैं। इसके चलते वे अपने मुख्य दायित्व—’शिक्षण’—पर पूरा समय नहीं दे पाते।
संसाधनों का अभाव: विशेष रूप से दूरस्थ और बस्तर-सरगुजा जैसे वनांचल क्षेत्रों में जर्जर स्कूल भवन, नेटवर्क की कमी और एकल-शिक्षकीय विद्यालय जैसी समस्याएं शिक्षकों के मनोबल को तोड़ती हैं।
समाज का बदलता नजरिया
एक समय था जब शिक्षक का दर्जा समाज में सर्वोच्च माना जाता था। लेकिन आज के डिजिटल और व्यावसायिक युग में शिक्षक-छात्र के रिश्तों में भी बदलाव आया है। समाज की अपेक्षाएं तो शिक्षकों से बहुत बढ़ गई हैं—उन्हें डिजिटल एक्सपर्ट, काउंसिलर और नैतिक मार्गदर्शक सब एक साथ बनना है, लेकिन बदले में उन्हें जो सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए, उसमें आज भी भारी कमी महसूस की जाती है।
क्या है समाधान?
केवल एक दिन मंच से भाषण देने या शॉल-श्रीफल से सम्मानित कर देने से शिक्षकों का भला नहीं होगा। यदि हम वास्तव में एक सशक्त और शिक्षित समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो:
प्रशासनिक पारदर्शिता: शिक्षकों की पदोन्नति, तबादले और वेतन विसंगतियों का त्वरित और पारदर्शी समाधान हो।
गैर-शैक्षणिक दायित्वों से मुक्ति: शिक्षकों को केवल पठन-पाठन और शोध के कार्यों तक ही सीमित रखा जाए।
सुरक्षित और आधुनिक वातावरण: ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं और डिजिटल संसाधन तुरंत मुहैया कराए जाएं।
निष्कर्ष:
शिक्षक दिवस केवल उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का दिन है। समाज और सरकार दोनों को यह समझना होगा कि जब तक गुरु का जीवन अभावों और अनिश्चितता से घिरा रहेगा, तब तक हम एक सशक्त ‘ज्ञान-आधारित समाज’ की कल्पना नहीं कर सकते। गुरुओं को उनका वाजिब हक और सम्मान देना ही इस दिवस की वास्तविक सार्थकता होगी।





