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शिक्षकों के प्रमोशन और पात्रता परीक्षा : मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकारों के रुख में विरोधाभास सरकार शिक्षकों के साथ किस हद तक खड़ी है जानिये ?

मध्यप्रदेश में विभाग का यह तर्क है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम अप्रैल 2010 में लागू हुआ था, जबकि शिक्षकों की भर्ती के लिए पात्रता परीक्षा की व्यवस्था वर्ष 2005 से ही अस्तित्व में थी। उस समय ली गई पात्रता परीक्षा का पैटर्न भी टीईटी जैसा ही था। ​अन्य राहतें: इसके साथ ही मध्यप्रदेश सरकार शिक्षकों के लिए आपसी सहमति से जिला और स्कूल बदलने (म्यूचुअल ट्रांसफर) तथा पति-पत्नी को एक जिले में लाने जैसी सहूलियतें भी प्रदान कर रही है। ​छत्तीसगढ़ के शिक्षकों की पीड़ा ​छत्तीसगढ़ में इसके विपरीत स्थिति होने के कारण शिक्षक वर्ग बेहद हैरान और परेशान है। शिक्षकों का सवाल है कि "आखिर हमारी गलती कहाँ है?"

रायपुर /भोपाल

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प्रवक्ता.कॉम 14 अगस्त 2026


​शिक्षकों के प्रमोशन और पात्रता परीक्षा (टीईटी) के मुद्दे पर देश के दो पड़ोसी राज्यों—मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़—की सरकारों के रवैये में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है। जहाँ एक तरफ मध्यप्रदेश सरकार अपने राज्य के लगभग 75 हजार शिक्षकों के हक में मजबूती से खड़ी नजर आ रही है और सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटा रही है, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ सरकार का रुख इसके विपरीत दिखाई दे रहा है, जहाँ विधानसभा में विभागीय परीक्षा से इनकार किए जाने के कारण शिक्षक असमंजस और हैरानी में हैं।
​दोनों राज्य सरकारों के स्टैंड की तुलना

मध्यप्रदेश सरकार का रुखछत्तीसगढ़ सरकार का रुख
शिक्षकों के प्रति दृष्टिकोणसहयोगात्मक एवं समर्थन: सरकार शिक्षकों के प्रमोशन का रास्ता साफ करने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँची है।निराशाजनक: विधानसभा में विभागीय परीक्षा से इनकार किए जाने से शिक्षकों में नाराजगी और भ्रम है।
कानूनी एवं वैधानिक तर्कपावरफुल दलील:

सरकार का तर्क है कि 2005 और 2008 में हुई संविदा शाला शिक्षक श्रेणी-2 की पात्रता परीक्षा का पैटर्न टीईटी जैसा ही था, इसलिए शिक्षकों को दोबारा टीईटी देने के लिए बाध्य न किया जाए।स्पष्ट विभागीय परीक्षा या राहत के पक्ष में सकारात्मक पहल का अभाव, जिससे शिक्षक खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
राहत के प्रयासलगभग 75 हजार पुराने शिक्षकों के प्रमोशन और ट्रांसफर (आपसी सहमति से स्कूल बदलने) जैसी राहतें दी जा रही हैं।शिक्षकों के समक्ष भविष्य का संकट और विभागीय परीक्षाओं को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
मध्यप्रदेश सरकार का विस्तृत पक्ष सुप्रीम कोर्ट में
​सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका: वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त लगभग 75 हजार शिक्षकों के प्रमोशन का रास्ता खोलने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में पूरक याचिका दायर की है।
​मुख्य तर्क:

विभाग का यह तर्क है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम अप्रैल 2010 में लागू हुआ था, जबकि मध्यप्रदेश में शिक्षकों की भर्ती के लिए पात्रता परीक्षा की व्यवस्था वर्ष 2005 से ही अस्तित्व में थी। उस समय ली गई पात्रता परीक्षा का पैटर्न भी टीईटी जैसा ही था।
​अन्य राहतें: इसके साथ ही मध्यप्रदेश सरकार शिक्षकों के लिए आपसी सहमति से जिला और स्कूल बदलने (म्यूचुअल ट्रांसफर) तथा पति-पत्नी को एक जिले में लाने जैसी सहूलियतें भी प्रदान कर रही है।
​छत्तीसगढ़ के शिक्षकों की पीड़ा
​छत्तीसगढ़ में इसके विपरीत स्थिति होने के कारण शिक्षक वर्ग बेहद हैरान और परेशान है। शिक्षकों का सवाल है कि “आखिर हमारी गलती कहाँ है?” जब एक राज्य सरकार नियमों की आड़ लेकर अपने शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक जा सकती है, तो दूसरे राज्य के शिक्षकों को ऐसी राहतों से क्यों वंचित रखा जा रहा है। विधानसभा में विभागीय परीक्षा से साफ इनकार किए जाने के बाद छत्तीसगढ़ के शिक्षकों का भविष्य अनिश्चितता के घेरे में आ गया है।

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