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2018 का वो ‘संकल्प’ जो रखना होगा याद: जब संविलियन के लिए शिक्षकों ने खाई थी सरकार बदलने की कसम एक दृढ़ ऐतिहासिक आंदोलन की कहानी

रायपुर प्रवक्ता.कॉम 19 जून 2026

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​रायपुर। छत्तीसगढ़ के सियासी गलियारों और शिक्षा जगत में इतिहास खुद को दोहराता हुआ दिख रहा है। लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) द्वारा हाल ही में बायोमैट्रिक उपस्थिति और वेतन रोकने को लेकर जारी किए गए कड़े फरमान ने शिक्षकों के पुराने जख्मों को हरा कर दिया है। आज के इस तनावपूर्ण माहौल के बीच, राजनीतिक विश्लेषकों और शिक्षक संगठनों ने साल 2018 की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाई है, जो सालों के शोषण और भेदभाव की उपज थी , जिसने तत्कालीन सरकार की विदाई में एक बड़ी भूमिका निभाई थी।


क्या थी 2018 की वह ऐतिहासिक घटना?


​साल 2018 में छत्तीसगढ़ के लाखों शिक्षाकर्मी (वर्तमान शिक्षक संवर्ग) अपनी एक सूत्रीय मांग ‘संविलियन और नियमितीकरण’ को लेकर महीनों से आंदोलनरत थे। तत्कालीन रमन सिंह सरकार द्वारा उनकी मांगों को लगातार अनसुना किया जा रहा था, जिससे शिक्षकों का आक्रोश सातवें आसमान पर पहुंच गया था।
​इस अनसुनी के विरोध में प्रदेश भर के हजारों शिक्षकों ने एक अभूतपूर्व और सामूहिक कदम उठाया था। राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों में शिक्षकों ने सामूहिक रूप से हाथ में गंगाजल लेकर और कसम खाकर संकल्प लिया था कि वे इस बार तत्कालीन सरकार को वोट नहीं देंगे और सत्ता से बेदखल कर के ही दम लेंगे।
​चुनाव पर क्या पड़ा था असर?


​शिक्षकों का यह गुस्सा सिर्फ एक खोखली धमकी नहीं साबित हुआ। छत्तीसगढ़ में शिक्षक और उनका परिवार एक बहुत बड़ा और प्रभावी वोट बैंक है, जो ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्रों तक सीधे तौर पर मतदाताओं को प्रभावित करता है।
​प्रशासनिक रीढ़ का टूटना:

शिक्षक न केवल खुद एक बड़ा वोट बैंक हैं, बल्कि वे हर चुनाव में मतदान केंद्रों पर चुनाव संपन्न कराने वाली मुख्य प्रशासनिक रीढ़ होते हैं।
​सत्ता परिवर्तन:

2018 के विधानसभा चुनाव में शिक्षकों की सामूहिक नाराजगी का सीधा असर नतीजों पर दिखा। 15 साल से सत्ता में काबिज भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा और वह महज 15 सीटों पर सिमट गई थी।
​क्या इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है?

अब वही हरकते दोहराई जा रही हैं
​आज जब DPI द्वारा तकनीकी कमियों को सुधारे बिना सीधे जून महीने का वेतन रोकने जैसा दंडात्मक आदेश जारी किया गया है, तो शिक्षकों में वही 2018 वाला आक्रोश फिर से पनपने लगा है। यह शिक्षकों को प्रताड़ित करने का एक आलोच्य कदम है।
​शिक्षक प्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार को नौकरशाही के ऐसे फैसलों पर लगाम लगानी चाहिए जो सीधे कर्मचारियों के पेट पर लात मारते हैं। अगर समय रहते इस ‘उकसावे’ वाले आदेश को वापस नहीं लिया गया या इसमें सुधार नहीं किया गया, तो शिक्षकों का यह गुस्सा एक बार फिर चुनावी साल में सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बन सकता है।
​”इतिहास गवाह है कि जब-जब छत्तीसगढ़ के शिक्षकों को प्रताड़ित किया गया है या उनकी जायज चिंताओं को अनसुना किया गया है, तब-तब सत्ता की कुर्सियां हिली हैं। 2018 का सबक आज भी उतना ही प्रासंगिक है।”

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